Featured Post

Allahpathy:THE BLESSING MONEY BAG THAT WOULD HELP EVERYONE TO BE RICH IN THE MONTH OF RAMADAN

By Hazrat Hakeem Mohammad Tariq Mahmood Chughtai Dear Readers! I Bring to you precious pearls and do not hide anything, you shou...

Wednesday, September 21, 2016

Al-Fatiha Life Healing Energy मन की मुरादें पाएँ, यक़ीन की ताक़त से

17th July 2016, 8:52pm

रिसर्च : डा. अनवर जमाल


ईमेल:allahpathy@gmail.com

मनचाहा पति कैसे पाएँ?:Practical Training

मीना एक आफ़िस में चपरासी है। वह 8 साल पहले विधवा हुई थी। उसकी शादी के 3 साल बाद ही उसके पति की मौत हो गई थी। उसे अपने पति की मौत के बाद उसके आश्रितों में नौकरी मिल गई थी। तक़रीबन 4-5 सालों से वह सरकारी कागज़ इधर से उधर पहुंचा रही है। उसकी आँखों में ऐसा सूनापन और चेहरे पर ऐसी उदासी छाई रहती थीजिसे देखकर मैं समझ गया कि इसके सपने मर चुके हैं।

मीना की उम्र ज़्यादा नहीं है। वह ख़ूबसूरत भी है। कोई ऐसी वजह नहीं है कि फिर से उसकी शादी  हो सके। जब कभी मेरी नज़र उस बहन पर पड़तीमैं मालिक से उसकी शादी और उसके अच्छे भविष्य की दुआ ज़रूर करता।
एक रोज़ मैं अपने एक शागिर्द समर ख़ान से मिलने के लिए उनके आफ़िस गया तो सामने से मीना निकल
कर गई।

मैंने समर ख़ान से कहा कि आप इसकी शादी के लिए दुआ किया करें।

मालिक के करम से तभी मीना कुछ काग़ज़ात
रिसीव कराने के लिए समर ख़ान के आफ़िस में  गई।
उनकी असिस्टेंट हेमा उससे बात करने लगी।
समर ख़ान  ने मीना को मेरी बात बताई कि हमारे भाई आपकी शादी के लिए दुआ करते रहते हैं।

मीना ने कहा कि मैं ख़ुद भी शादी करना चाहती हूं। मेरे रिश्ते आते हैं लेकिन फिर मेरा काम अटक जाता है। ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने मुझ पर कोई जादू वग़ैरह करवा दिया हो।

मैंने कहा कि मेरा ताल्लुक़ देवबन्द से है। मैं जादू-टोने की हक़ीक़त को ख़ूब जानता हूँ। आप पर जादू का असर तो है लेकिन ख़ुद पर यह असर आपका अपना   किया हुआ है।
वह बोलीकैसे?
मैंने कहाआप चाहती हैं कि आपकी दोबारा शादी हो?
मीना बोलीहाँ
मैंने कहाफिर आपको यह डर भी सताता है कि लोग क्या कहेंगे?
मीना बोलीहाँ
मैंने कहायही डर आपका काम अटका रहा है। आप इस डर को अपने दिल से निकाल दीजिए। आपका काम हो जाएगा। समाज के रिवायती लोग तो विधवाओं को तिल तिल करके मरते देखना चाहते हैं।
उनकी ख़ुशी के लिए अपनी ख़ुशियों का गला
घोंटना अक्लमन्दी नहीं है। अब औरतों को विधवा होने के बाद सती और बर्बाद की कोई ज़रूरत
नहीं है। मालिक की दया से आपकी शादी ज़रूर होगी और आपको अच्छा पति मिलेगा।
मीना ने पूछा कि मुझे क्या करना होगा?

मैंने उसे क़ुरआन की सबसे बड़ी दुआ अलफ़ातिहा के ज़रिए हीलिंग इनर्जी दी। ज़िन्दगी के बारे में उसके नज़रिए को सही किया। उसे अल्लाह की मदद का यक़ीन दिलाया।

मैंने कहाआप उस मालिक को याद कीजिएजिसने आपको पैदा किया हैजिसकी रहमत से आप ज़िन्दा हैं और हर पल साँस लेती हैं। वही एक रब सबका मालिक है। आप उसी मालिक की प्रॉपर्टी हैं और अपनी प्रॉपर्टी की केयर करना वह खूब जानता है। आप सोने से पहले उसका नाम लीजिए।

आप सबका मालिक एक’ और ‘अल्लाह मालिक’ यह कहिए। उससे अपने काम में मदद   माँगिए। इसके बाद जैसा पति आपको चाहिएउसके गुणों पर विचार कीजिए और उसका   स्वरूपउसकी एक इमेज अपने मन में बनाईये।

अपने नए पति की उम्रआमदनीरंगक़दआदत और यह कि वह शहरी हो या देहातीयह सब बिल्कुल साफ़ साफ़ सोच लीजिए। इसे किसी कार्ड पर लिखकर इसे अपने पास रख लीजिए। इसके बाद आप उस पति को अपने मन की आंखों से अपने घर में मौजूद देखिए। यह विचार लेकर आप सो जाईये और फिर सुबह को उठते ही यही विचार कीजिए। दिन में भी आप इस विचार को अपने में ताज़ा करती रहिए। आप यक़ीन कीजिए कि आपका सपना पूरा होगा।

मैं उसे यक़ीन दिलाते दिलाते ख़ुद इतना यक़ीन से भर गया कि मेरे मुँह से यह भी निकल गया कि 'मालिक ने चाहा तो एक हफ़्ते में आपका काम हो जाएगा।'

...और वाक़ई एक हफ़्ते में उसका काम हो गया।
19 नवम्बर 2014 को नन्हे भाई ने ख़बर दी कि मीना ने 18 नवम्बर को एक लड़के के साथ कोर्ट मैरिज कर ली है। दोनों पक्षों की तरफ़ से उनका कोई भी घरवाला शामिल नहीं हुआ।

मैं ख़ुश हुआ कि दोनों पक्षों की तरफ़ से कोई शामिल नहीं हुआ,  सही लेकिन मीना की नैया पार लग गई। जो काम 8 साल से अटका पड़ा था, वह अल्लाह की मदद से 8 दिन में हो गया। 

मीना 20 नवम्बर 2015 को अपनी माँग में सिन्दूर लगाकर आई। उसका चेहरा ख़ुशी और   मेक अप, दोनों की वजह से लाल हो रहा था। उसने कीमती साड़ी  ज़ेवर पहन रखे थे।   उसने मुझेसमर ख़ान को और हेमा को बरफ़ी खिलाई। उसका चेहरा खिला हुआ था। उसने बताया कि भाई साहबमैंने जिस दिन दुआ की उससे अगले दिन ही रिश्ता  गया था। मेरे पति बहुत सुन्दर हैं। वह सरकारी जॉब में तीसरे ग्रेड पर हैं। उसने अपने मोबाईल में अपने नए पति का फ़ोटो दिखाया। वाक़ई वह एक अच्छी शक्ल का नौजवान है।
मीना बोलीआपका बहुत बहुत शुक्रिया।
मैंने कहाअब तो हमारे काम की शुरूआत हुई है। अब हम तुम्हें बहुत से बच्चों का वरदान देते हैं। कम बच्चों की बात कभी मत सोचना। बच्चे जितने ज़्यादा होंउतना ही अच्छा है। सोचना कि पूरा शहर तुम्हारे बच्चों से भर गया है। तुम्हारे पास दौलत बहुत आएगी।
मीना मुस्कुरा कर सुनती रही।
मैंने यह भी कहाअपने पति को बचा कर रखना।   जब कभी उसके पास तुम्हारे रिश्तेदार बैठें तो वहां मौजूद रहना। कुछ ग़लत क़िस्म के रिश्तेदार ग़लत बातें कह जाते हैं और रिश्ता बिगाड़ देते हैं।
मीना ने हामी भरी और अपने आफ़िस वालों को मिठाई खिलाने चली गई।

मालिक हरेक लड़की को,  हरेक विधवा और तलाक़शुद औरत को ज़्यादा से ज़्यादा सुख दे और उनके दिल से दुनिया का डर निकाल देजिसने उनका जीवन दुखों से भर दिया है।
अक्सर डर बेकार होते हैं। यह सपने साकार होने की दुनिया है।
आप सपने देखिएउनके पूरा होने का यक़ीन कीजिए।
अपने मनवचन और कर्म से अपने सपनों को सपोर्ट कीजिए।
समय आने पर वह सहज ही पूरा हो जाएंगे।
यह ईश्वर अल्लाह की प्राकृतिक व्यवस्था है।
कुंवारी लड़कियां भी इसी विधि से अच्छा पति पा सकती हैं। उन्हें अपने मन से यह डर निकाल देना चाहिए कि उनके पास देने के लिए बहुत सा दहेज नहीं है या उनका क़द छोटा है या उनका रंग सांवला है या उनकी एजुकेशन कम  है, इसलिए उन्हें अच्छा पति नहीं मिलेगा।
दिल से हरेक डर निकाल देने के बाद अच्छे पति के बारे में सोचिए कि आपकी नज़र में एक   अच्छे पति में क्या गुण होने चाहिएं और फिर अपने मन में उसके साथ अपना विवाह होते हुए   देखिएबस। हो गया काम।
एक आसान काम को बेवजह के डर ने इतना मुश्किल बना दिया है कि बहुत सी लड़कियां उस आदमी से शादी कर बैठती हैंजिसकी सूरत और सीरत को वे पसन्द नहीं करतीं।

औरत हो या मर्द, कोई बूढा हो या बच्चा या फिर चाहे कोई ग़रीब  हो या बीमार, उसे  अपनी हक़ीक़त और अपने अंदर की शक्ति को  पहचानना होगा अपनी सही पहचान के बाद उसे सारी ख़ुशियां आसानी से मयस्सर होती चली जाएंगी।
पिछले 30 सालों में हमने अपने बुज़ुर्गों की ज़िन्दगी में, अपनी और अपने दोस्तों की ज़िन्दगियों में अल्लाह की क़ुदरत के ऐसे सैकड़ों चमत्कार और मौज्ज़े देखे हैं। सैकड़ों लोगों को हम रोज़ वेलनेस कोचिंग देते हैं। अल्लाह उनकी भी मुरादें पूरी करता  है। वह उनके भी बिगड़े काम बनाता है। 
सब कुछ सही जानकारी और उस पर यक़ीन व अमल पर 


मन की मुरादें पाएँयक़ीन की ताक़त से
जब इंसान के दिल में किसी चीज़ की ख़्वाहिश बार बार गश्त करती है तो वह मुराद बनकर उसके मन में क़ायम हो जाती है।

यह पहला मरहला होता है
यह एक Vision होता है

दूसरा मरहला यक़ीन का होता है।
जब आदमी को यक़ीन होता है कि यह चीज़ मिल सकती है तो वह उसे पाने के रास्ते और ज़रिये तलाश करता हैअंदरूनी और बाहरी कोशिश करता है। नतीजे में उसका conscious mind उस चीज़ पर focus हो जाता है। वह ख़ुद को उस चीज़ के साथ देखता है।

मानो वह चीज़ उसके पास इसी वक़्त मौजूद है।
स तरह की images उसके mind में बार बार बनती हैं तो वे subconscious mind में commands की तरह दाख़िल हो जाती हैं।

जिस चीज़ पर conscious mind फोकस हो जाता है subconscious mind उसे attract कर लेता हैया उसे पाने के साधनों को, means को attract कर लेता है।

तीसरा मरहला चीज़ पा लेने का मरहला है।
जब चीज़ ज़ाहिरी दुनिया में पास आ जारी है त मुराद पूरी हो जाती है। हर मुराद ऐसे ही पूरी होती है। अल्हम्दुलिल्लाह



जिस चीज़ के मिलने के बारे में आदमी को शक हो जाता हैतो मन की मुराद पूरी होने री natural process रुक जाती है और तीसरा मरहला नहीं आता।  वह चीज़ physical world में ज़ाहिर नहीं हो पाती।

शक,  दरअसल यक़ीन होता है चीज़ के न मिलने का।

हर आदमी बचपन से एक ख़ास तरह के माहौल में चीज़ों को होता हुआ देखता है। इससे उसका एक 'यक़ीनबन जाता है की कौन सी चीज़ हो सकती है और कौन सी चीज़ नहीं हो सकती।

हर इंसान को उसकी ज़िन्दगी में उसके यक़ीन के मुताबिक़ ही चीज़ें मिलती है।

इंसान अपने यक़ीन से unconscious हैunaware है।  उसका यक़ीन माहौल के असर से ख़ुद ब ख़ुद बन चुका होता है। अक्सर उसे अपने साथ 'कुछ बुराहोने का डर लगा रहता है।

क्यों ?
...क्योंकि वह दूसरों के साथ 'बुराहोते हुए देखता है और उसके साथ भी कुछ बुरा हो चुका होता है।

इससे उसका एक यक़ीन बन जाता है की यह दुनिया एक ऐसी जगह है जहाँ ज़िन्दगी में कभी भी 'कुछ बुराहो सकता है।  इस यक़ीन की वजह से उसके साथ 'कुछ बुराहोता रहता है।


उसके साथ 'कुछ बुराहोते देखकर दूसरे लोगों को भी यक़ीन हो जाता है कि इस दुनिया में किसी के साथ कभी भी 'कुछ बुराहो सकता है।

के इस यक़ीन की वजह से उके दिल में डर पैदा होता है कि 'फुलांआदमी के साथ ऐसा हुआकहीं ऐसा हमारे साथ हो गया तो क्या होगा ?

बीमारी, accident, और नौकरी छिन जाने के वाकेआत देख कर वह खुद के बीमारज़ख़्मी या jobless होने की तस्वीरें अपने मन में देखने लगते हैं।

सब का मन बेक़ाबू है। सबके मन में डर है। किसी के मन में एक तरह का डर है और किसी के मन में दूसरी तरह का डर है। आज डर और ग़म इंसान के वुजूद में समा चुके हैं।

अक्सर इंसान ऐसी बातों से डरता हैजो शायद उसके साथ कभी न होंलेकिन अपने डर की वजह से वह उन्हें अपनी ज़िन्दगी में वुजूद बख़्श देता है।

जहाँ डर होता हैवहाँ ग़म ज़रूर होता है।

जहाँ ग़म होता हैवहाँ ग़ुस्सामायूसीबेचैनी और शिकायतें भी होती हैं।


जहाँ ग़ुस्सा और शिकायतें होती हैं

वहाँ लड़ाई - झगड़े भी होते हैं

जहाँ लड़ाई - झगड़े होते हैं, वहाँ नफ़रत भी होती है

जहाँ दूसरों से नफ़रत होगी वहाँ दूसरों का बुरा चाहने की बात भी ज़रूर पायी जाएगी। 
जब आदमी ग़मग़ुस्से और नफ़रत से भरा होगा और दिल से अपने दुश्मनों का बुरा चाहता होगा तो उसके दिल में बुराई बैठ जाएगी। वह बुराई ख़ुद उसके वुजूद काउसके being का हिस्सा बन जाती है। तब उसके अपने ही साथ बुरे हादसे और नुक़्सान ख़ुद  ख़ुद होने लगते हैं।

जब वह अपने बारे में कुछ बुरा होने से डरता है भी उसके साथ कुछ बुरा हो जाता है।

आदमी नहीं जानता कि उसके मन के बेक़ाबू होने से उसका डरग़मग़ुस्सा और नफ़रत सब कुछ बेक़ाबू है।

आदमी को जब ख़ुद पर ही क़ाबू नहीं है तो उसे अपने काम और उसके अंजाम पर भी क़ाबू नहीं हो सकता।

बुराई का अंजाम बुरा होता है।

बुरे अंजाम से बचना है तो भलाई को चुनें।

बुराई को भलाई से बदलें।

जब आपको अपने साथ कुछ बुरा होने का डर सताए तब अल्लाह की ख़ूबियों को याद करेंजिसने आपको 'अलक़से पैदा किया। जिसने ज़मीनो-आसमान की हर चीज़ को पैदा किया। उनकी हिफाज़त की है और कर रहा है। जिसने सय्यिदना नूह अ0 की नाव की हिफाज़त कीजिसमें हमारे बुजुर्ग़ सवार थे। वे बुजुर्ग़ न बचते तो आज यहाँ हम भी न होते।

जब हमारी हिफाज़त के लिए अल्लाह हमारे साथ है तो हम अल्लाह के सिवा किसी ऐसी चीज़ से क्यों डर रहे हैंजिससे डरने के लिए अल्लाह ने मना किया है ?

हम ऐसा ग़म क्यों कर रहे हैंजिससे अल्लाह ने रोका है ?

हम इस बात पर ख़ुश क्यों नहीं होते कि अल्लाह हमारे साथ हैजो हर चीज़ पर क़ादिर (समर्थ) है।

वह रब हमारा भला करना चाहे तो कोई हमारा बुरा नहीं कर सकता और अगर वह हमारा कुछ नुक़्सान करना चाहे तो कोई हमें नफ़ा नहीं पहुँचा सकता।

... और अल्लाह जिसके साथ जो कुछ करता हैअपने क़ानून के मुताबिक़ करता है।

अल्लाह का क़ानून यह है कि जो लोग भलाई के काम करते हैंउन्हें भलाई ही नसीब होती है। 
आप अपने यक़ीन के मुताबिक़ ही अमल करते हैं।
आपके आमाल भी आपके यक़ीन के मुताबिक़ ही कामयाब होते हैं।
आपका यक़ीन, आपके आमाल और उनके अंजाम हर जगह काम करते हैं। आख़िरत में भी और उससे पहले दुनिया में भी। 
आपको आपके यक़ीन के मुताबिक़ ही मिलता है और मिलेगा।

अब यह बात हर तरफ़ कही जा रही है कि अगर आप कहते हैं ‘I can’ तो आप सच कहते हैंअगर आप कहते हैं ‘I cannot’ तो भी आप सच कहते हैं।
ख़ुद  के बारे में आपका जो भी यक़ीन है, वह सामने आता है।  
ख़ुद के बारे में आप अपना यक़ीन अच्छा बनाएं।

आपके मन में बचपन से माहौल के असर से जो यक़ीन ख़ुद ब ख़ुद बनता चला आया हैउसने आपके अपने बारे में भी आपका एक यक़ीन बना दिया है कि आप कैसे आदमी हैं ?

आप कैसी चीज़ेंकैसी सेहत, कितनी इज़्ज़तकितनी दौलत और कितनी ख़ुशी और कामयाबी पाने के 'हक़दारहैं ?

आपके मन की जो मुरादें आपके इस यक़ीन के मुताबिक़ होती हैंवे ज़रूर पूरी होती हैं।


आम तौर पर आदमी की ज़िन्दगी में ऐसे वाक़ये हुए होते हैं कि उसने किसी के साथ बुरा किया होता हैया उसके साथ किसी ने बुरा किया होता है।

वह ख़ुद हसासे जुर्म और शर्मिंदगी के साथ जीता है।

वह अपने आपको अच्छा आदमी नहीं मानता।

उसके अन्दर ख़ुद से नफ़रत का जज़्बा होता है।

यह जज़्बात उसके अन्दर सज़ा का तक़ाज़ा करते हैं और उसका subconscious mind उसके लिए ऐसे बुरे हालात पैदा करता है जिनसे वह दुःख दर्द महसूस करता है।

आदमी इस बात unconscious रहता है कि अपने आपको वह ख़ुद जज कर रहा है और ख़ुद को ख़ुद ही सज़ा दे रहा है और यह कि वह जब चाहे अपने आपको माफ़ कर सकता है। वह जब चाहे ख़ुद पर रहम कर सकता है।

self compassion से वह अपने हालात बदल सकता है।

वह जब चाहे self-concept बदल सकता है।

वह जब चाहे अपने अक़ीदेअपने beliefs बदल सकता है।

जिस बात को आप स मानते हैं वह आपका belief है।

आपका belief system ही आपका paradigm है।
आपका paradigm आपके कल्चर की देन है।

आप अपनी मुराद पूरी होने पर यक़ीन या शक भी अपने paradigm के मुताबिक़ ही करते हैं।


अगर आप कोई चीज़ चाहते हैं और वह, आपको काफ़ी वक़्त गुज़रने के बादअभी तक नहीं मिली है तो इसका मतलब यह है कि आपका paradigm आपकी मुराद को support नहीं कर रहा है।

आपको अपना paradigm चेंज करना होगा।

paradigm चेंज होता हैनई ख़बरों से।

नई जानकारी हासिल करें ताकि आपका मन नई जानकारी को process करके नए नतीजों का यक़ीन कर सके।

ऐसे लोगों के साथ रहें या उनके बारे में पढ़ेजिन्होंने इन चीज़ों को हासिल किया है। उनके तरीक़ों को आज़माएं।

कुछ महीनों तक लगातार ऐसा करते रहने से paradigm चेंज हो जाता है।

आपके self respect और self worth महसूस करने के लिए ख़ुद को ख़ुदा की नज़र से देखें।

अल्लाह ने सय्यिदना आदम अ0 की औलाद को इज़्ज़त बख़्शी है।

जुर्म के एहसास की वजह से shame & guilt के जज़्बात हों,  ख़ुद से घिन आती हो तो तौबा करके इन्हें ख़ुद से दूर कर लें।


अपना नज़र, दिलबदनलिबास और जगह को पाक रखें।

अल्लाह तौबा करने वालों को और बहुत पाक रहने वालों को मबूब रखता है।

सो अपने आप सेआप ख़ुद भी मुहब्बत करें।


दूसरों को माफ़ करना सीखें।
ख़ुद को माफ़ करना भी सीखें।

आज तक जो कुछ बुरा आपने किसी के साथ किया या किसी ने आपके साथ किया वह सब आपके लिए एक सबक़ था। जो सबक़ आपको सीखना था वह आप सीख चुके हैं। अब उ दुख देने वाली यादों को मन में दोहराने की कोई ज़रूरत नहीं है।

अल्लाह ने आपको तौबा की तौफ़ीक़ दीइस पर शुक्र अदा करें।

ज़मीन से लेकर आसमान तक अल्लाह ने हर चीज़ को आपको नफ़ा पहुंचाने में लगा रखा है।

हर तरफ़ से आप हर पल बेशुमार नेमतों से घिरें हुए हैं। आप नेमतों को देखियेउनका बयान कीजियेउन पर शुक्र अदा कीजिये।

सुबह को सबसे पहला अमल शुक्र का कीजिए।
रात को सोने से पहले सबसे आख़री अमल शुक्र का कीजिए।

दिन में भी आप बार बार नेमतों पर शुक्र कीजिए।
आपके शुक्र के एहसास को कितनी शिद्दतसे महसूस करेंगेउतनी जल्दी आपको बरकत हासिल होगी।

शुक्र का मतलब यह भी है कि ज़िन्दगी की और नेमतों की क़द्र की जाए। उनकी केयर की जाए। उनका इस्तेमाल हमेशा भलाई में किया जाए।

इस अमल से आपकी state of consciousness ही चेंज हो जाती है।

जब आप अपने being पर काम करते हैं तो उसका असर आपके doing पर पड़ता हैऔर फिर having पर भी पड़ता है।

आपके मन की मुराद पूरी हो जाती है।

अगर आपको health चाहिए तो आपको health consciousness डेवलप करनी होगी।

अगर आपको wealth चाहिए तो आपको wealth consciousness डेवलप करनी होगी।

अगर आपको power चाहिए तो आपको power consciousness डेवलप करनी होगी।
अगर आपको success चाहिए तो आपको success consciousness डेवलप करनी होगी. 

अगर आपके ख़ुशी चाहिए को आपको ख़ुशी की consciousness डेवलप करनी होगी।

आपको जो चीज़ दरकार हैआपको ख़ुद में उसी चीज़ की consciousness डेवलप करनी होगी।

इसका तरीक़ा imagination हैजिसे creative visualization भी कहते हैं।  यह पूरी तरह scientific है।

participant बनकर मन चाही चीज़ या हालत को मन में देखना और उसे soundtastetouch और smell के साथ real feel करना उस चीज़ या हालत की consciousness को develop करता है।


यह बीज बोने की तरह है।
जो बीज आप आज बो रहे हैंfuture में आप उनकी फ़सल ही काटेंगे।

आप अंजीर बोएंगें तो अंजीर की फ़सल ज़रूर मिलेगी।

आपके पास 'आजहै, 'अबहै और 'यहाँहै।

आप 'आज अब यहाँजो कर रहे हैंउससे कुछ बन रहा है।

आप 'आज अब यहाँख़ुद को जैसा feel कर रहे हैंfuture में आप वैसे ही बन जायेंगे।

इंशाअल्लाह

Quantum physics कहती है कि आपके देखने का असर energy पर पड़ता है।

जिस चीज़ को आप देख रहें हैं आप उसे जन्म दे रहे हैं।

आप energy को जानिए,
आप अपने मन को जानिए

अपने मन में डूबकर पा जा सुराग़ ए ज़िन्दगी 
तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन

अल्लामा इक़बाल रह0

Allahpathy क़ुरआन से इलाज करने के बदले माल लेने के बारे में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का हुक्म और उनके सहाबा रजि़. का तरीक़ा



इमाम इब्ने क़य्यिम रहमतुल्लाहि अलैह लिखते हैं-
इमाम बुख़ारी रहमतुल्लाहि अलैह और इमाम मुस्लिम रहमतुल्लाहि अलैह ने सहीहैन में हज़रत अबू सईद ख़ुदरी रजि़यल्लाहु अन्हु से रिवायत की है। उन्होंने बयान कियाः
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबा की एक जमात एक सफ़र में निकल पड़ी। सफ़र करते करते अरब के एक क़बीले में उतरे और उनसे मेज़बानी क़ुबूल करने की दरख़्वास्त की। उन्होंने मेज़बानी क़ुबूल करने से इन्कार कर दिया। इतने में उनके सरदार को डंक लगा। उन्होंने हर मुमकिन तदबीर कर डाली मगर कोई तदबीर कारगर साबित न हुई। उस क़बीले के बाज़ लोगों ने कहा कि यह क़ाफि़ला जो तुम्हारे यहां आया है उनके पास चलो। शायद उनमें से किसी के पास कोई तदबीर हो।
चुनांचे वे सहाबा ए रसूल स. के पास आए और उनसे कहा-‘ऐ क़ाफि़ले के लोगो! हमारे सरदार को डंक लग गया और हर मुमकिन तदबीर हमने कर डाली मगर कुछ फ़ायदा न हुआ। क्या तुम में से किसी के पास इसका इलाज है?
उनमें से बाज़ ने कहा कि हाँ, अल्लाह की क़सम मैं झाड़ फूंक करता हूँ, मगर ज़रा सोचो कि हमने तुमसे मेहमानदारी करने की दरख़्वास्त की तो तुम लोगों ने हमारी इस दरख़्वास्त को ठुकरा दिया और हमारी मेज़बानी न की। मैं दम उस पर उसी वक़्त कर सकता हूँ, जब तुम उस पर कुछ उजरत मुक़र्रर करोगे।
चुनाँचे भेड़ों की एक तादाद पर मामला तय हो गया। उन्होंने उस पर ‘अल्हम्दुलिल्लाहि रब्बिल आलमीन’ पढ़ते हुए दम करना शुरू किया। उसका असर यह हुआ कि वह ऐसा चंगा हो गया गोया कि उसे किसी बन्धन से रिहाई मिली हो और वह चलने फिरने लगा। उसे कोई तकलीफ़ न थी। फिर उसने कहा कि इन लोगों को उनकी तयशुदा पूरी पूरी उजरत दे दो। चुनाँचे उन्होंने उजरत दे दी।
उसमें बाज़ सहाबा ने कहा कि आपस में इसे बाँट लो। इस पर दम करने वाले शख़्स ने कहा कि जब तक हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास न पहुँच जाएं, उस वक़्त तक कुछ न करो और हम आपके हुक्म के मालूम हो जाने तक उससे तवक़्क़ुफ़ करेंगे। चुनाँचे सब लोग रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आए और उन्होंने पूरा वाक़या बयान किया।
यह सुनकर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि तुमने ठीक ही किया। अब इसे आपस में बाँट लो और इसमें मेरा भी एक हिस्सा लगाना।’
-तिब्बे नबवी पेज 218 व 219 उर्दू तर्जुमाः हकीम अज़ीज़ुर्रहमान आज़मी
उर्दू से हिन्दी अनुवादः डा. अनवर जमाल यूसुफ़ ज़ई

अल्लाह की मदद रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में भी माँगिए
कामयाबी का नतीजा बहुत जल्दी आता है। कभी कभी तो फ़ौरन ही नतीजा आ जाता है। यह सब आपके यक़ीन पर है। जैसा कि आपने सहाबा रज़ि. के वाक़ये में देखा है।
अलफ़ातिहा के ज़रिये आप हर तरह के मामलों में अल्लाह से मदद मांग सकते हैं। आप रोज़मर्रा के घरेलू मामलों में भी अल्लाह से मदद मांग सकते हैं।
हमारी वाईफ़ अक्सर इस शक्तिशाली दुआ के ज़रिये अपने मामलों में अल्लाह की मदद पाती रहती हैं। जब हमारे बेटे अब्दुल्लाह ख़ान दो साल के हुए तब वह प्रेग्नेंट थीं। वह अब्दुल्लाह का दूध छुड़ाना चाहती थीं लेकिन अब्दुल्लाह ख़ान किसी तरह भी माँ का दूध छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे।
हमारी वाईफ़ ने हमसे पूछा कि क्या करूँ?
हमने कहा कि अल्लाह से मदद माँगो।
उन्होंने रात का इस बरकत वाली दुआ के ज़रिये मदद माँगी कि अब्दुल्लाह ख़ान माँ का दूध छोड़ दें।
उन्होंने इस दुआ की इस आयत को बहुत ज़्यादा रिपीट किया-
‘इय्याका ना‘बुदु व इय्याका नस्तईन’
यानि हम आप ही की इबादत करते हैं और आप ही से मदद चाहते हैं।
सुबह को अल्लाह ने अपनी क़ुदरत का यह करिश्मा दिखाया कि अब्दुल्लाह ख़ान ने माँ का दूध छोड़ दिया।
जो काम नामुमकिन दिख रहा था। वह बहुत आसानी से हो गया।
अल्लाह का शुक्र है।

अल्लाह से मदद माँगने और पाने का बहुत आसान तरीक़ा
1. आप जो भी मुराद पाना चाहें, उसे किसी काग़ज़ पर लिखकर अपने पास रख लीजिए। इससे आपके मन में यह साफ़ हो जाएगा कि आप क्या चाहते हैं?
इसके बाद आप दुनिया की सबसे बड़ी दुआ अलफ़ातिहा 41 बार पढ़कर अल्लाह से मदद माँगिए।
आप किसी भी वक़्त इस दुआ को पढ़ सकते हैं। सबसे अच्छा वक़्त सुबह की अज़ान के आस पास का वक़्त है जो कि सूरज निकलने से डेढ़-दो घंटा पहले होता है। इस वक़्त दिल में सुकून होता है। कन्सन्ट्रेशन ज़्यादा होता है।

इस आयत को इसका मतलब समझकर यक़ीन के साथ चलते फिरते हुए भी ज़्यादा से ज़्यादा पढ़िए-‘इय्याका ना‘बुदु व इय्याका नस्तईन’
यानि हम आप ही की इबादत करते हैं और आप ही से मदद चाहते हैं।

अगर आपमें से कोई इस दुआ को पढ़ नहीं सकता तो वह मोबाईल में इन्टरनेट से क़ुरआन की यह दुआ डाउनलोड करके इयरफ़ोन के ज़रिए सुन ले।
कम से कम 41 बार सुने। इससे ज़्यादा सुने तो और ज़्यादा फ़ायदा होगा। नेगेटिव इनर्जी दूर होगी और पाॅज़िटिव इनर्जी बढ़ेगी। इससे आपकी मुराद ज़्यादा जल्दी पूरी होगी।

2. सिर्फ़ एक रब की ताक़त पर और उसकी रहमत पर पूरा यक़ीन रखें कि वह आपके साथ है और आपकी दुआ का जवाब हमेशा ‘हाँ’ में देता है। जिस रब ने आपको ज़मीनो आसमान दिया, परिवार और रिश्ते दिए, रूह और जिस्म दिए, बेशुमार नेमतें दीं, सबसे बड़ी दुआ दी। वह आपको आपके मन की मुराद ज़रूर देगा।

आप सब्र के साथ अपना यक़ीन बनाए रखें। आपका यक़ीन ही वह ताक़त है जो अल्लाह की ग़ैबी मदद को अट्रैक्ट करता है। बहुत जल्दी आपको रास्ते खुलते हुए नज़र आएंगे। कभी कभी तो काम ही तैयार हो कर सामने आ जाता है। शक न करें कि कैसे होगा या कब होगा?

3. आप अपने काम के बारे में जो भी जायज़ कोशिश कर सकते हैं, ज़रूर करें और अगर कुछ नहीं कर सकते तो रास्ते खुलने का इन्तिज़ार करें।  

कोई बात पूछनी हो तो आप हमें ईमेल कर सकते हैं, काॅल कर सकते हैं। 
email: allahpathy@gmail.com


Tuesday, April 12, 2016

Symbolic Story, Allahpathy ‘नीम’ हकीम साहिब का तरीक़ा ए इलाज (लुत्फि़या सबक़)

हमने रात बेसब्री से काटी और सुबह को उठकर पानी में भिगोए हुए पांच अंजीर खाए। पेट साफ़ हो गया। नाश्ते में तलबीना खाया और मिस्वाक करके बिन्ते हव्वा से अम्बर की ख़ुश्बू लगवाई और हमने अपनी बीवी का शुक्रिया अदा करके हकीम साहिब के नीम तले वाले दवाख़ाने की तरफ़ रवाना हो गए।

उनका दवाख़ाना सुबह सुबह ही खुल जाता है। वह कहते हैं कि इससे रोज़ी में बरकत होती है। हमने देखा कि चार-पांच मरीज़ हैं और उनका एक असिस्टेंट हावन दस्ते में दवाएं कूट रहा है। हकीम साहिब मरीज़ों को फ़ारिग़ करके ‘मक्तूबाते मुजद्दिी रह.’ पढ़ रहे हैं, आराम से। वह हार्ड वर्क नहीं करते। उनका कहना है कि जैसे जैसे इल्मो हिकमत बढ़ता जाता है, वैसे वैसे रोज़ी के लिए बदन की मशक़्क़त कम होती चली जाती है।
हमने तरीक़े के मुताबिक़ सलाम अजऱ् किया। वो बड़ी अदा से मुस्कुराए। उनकी उम्र कोई ज़्यादा नहीं है। काफ़ी प्रोडक्टिव भी हैं। सात-आठ बच्चे हैं, मा शा अल्लाह! वैसे भी ये हकीम और होम्योपैथ कभी बूढ़े नहीं होते। हकीम तो जवारिश जालीनूस, माजून आरदे ख़ूरमा और हलवा घीक्वार खाते रहते हैं और होम्योपैथ जिनसेंग और डेमियाना। नीम हकीम साहिब को तो ये दोनोें ही तरीक़ा ए इलाज मालूम थे। हम ख़ुद अपनी गृहस्थी उनकी दुआ और दवा की बरकत से खींच रहे थे।
हमने बड़े अदब से अजऱ् किया कि हज़रत कल एक बात अधूरी रह गई थी। आपने कहा था कि आप कल बताएंगे कि चांदी चाचा आपका नाम आते ही इतना ख़फ़ा क्यों हो जाते हैं? जबकि वह आपको अपने घर पर एक बार दावत भी खिला चुके हैं और हमने उस दावत के फ़ोटो व्हाट्सएप पर देखे थे आपके ग्रुप पर।
हकीम साहिब ने फ़रमाया कि भाई, बात दरअसल यह है कि चांदी चाचा में छल कपट नहीं है। इनका पूरा घर ही नेक शरीफ़ और भोला भाला है। ये भोले इतने ज़्यादा हैं कि अगर चार लोग हमें मसीहा कह दें तो ये भी मान लेंगे कि हम मसीहा हैं और अगर इनके मिलने वाले चार लोगों का इज्मा हो जाए कि हकीम साहिब मश्कूक हैं तो ये भी मश्कूक हो जाएंगे।
दिलपुर में जब हमारा पहला लेक्चर हुआ तो यह हमें बस अड्डे तक बाइक से छोड़ने आए थे। चांदी चाचा ने हमें बड़ी इज़्ज़त दी थी। तब उन्होंने हमें बताया कि उनकी बेगम उन्हें छोड़कर अपने मायक़े चाक़ूपुर में जा बैठी हैं अपनी मां के पास। महीने हो गए हैं चार। मैं सोच रहा हूं कि उन्हें तलाक़ दे दूं।
तब हमने उन्हें आधा घंटे वहीं सड़क पर खड़े हो कर समझाया था कि यह ‘ख़याल’ अपने दिल से निकाल दो। इस तरह के हालात निकाह के बाद आते हैं और जब उन्हें नरमी से हैंडल किया जाता है तो वे हल हो जाते हैं और फिर लाइफ़ ख़ुशगवार गुज़रती है।
हमने उन्हें कुछ ऐसी बातें मज़ीद बताईं जिनसे मियां-बीवी में मुहब्बत बढ़ती है। फिर एक बार जयपुर से लौटते वक़्त हम इनके घर गए ताकि हम चांदी चाचा के दिल को मज़ीद तक़कियत दें। उसी दिन उन्होंने हमें मुगऱ् खिलाया था, जिसके फ़ोटो दुनिया ने देखे थे। उस फ़ोटो में चांदी चाचा मा शा अल्लाह बहुत प्यारे नज़र आ रहे थे। हो सकता है कि उसे देखकर ही किसी की नज़रे बद लग गई हो हमारे रिश्ते को।
‘फिर बीवी लौटी क्या हकीम साहिब?’-हमने तजस्सुस के साथ पूछा।
‘हां, लौट आई। अल्लाह का शुक्र है। बिछड़ों को मिलाना ही तो अपना काम है।‘-हकीम साहिब ने कहा।-‘इसी के साथ इनके दो काम और हुए।’
‘वह कौन से काम हुए?’-हमने पूछा।
‘इनकी अम्मी और नानी साहिबा बहुत नेक और वलिया औरतें हैं लेकिन वे भी बहुत भोली और भली हैं। डेढ़ साल से उन्होंने अपनी एक बेटी को ससुराल नहीं भेजा था। उन्होंने हमसे उस लड़की के बारे में सलाह मांगी कि हम इस लड़की को तलाक़ दिलवा कर दूसरी जगह इसका निकाह करने की सोच रहे हैं। हमने पूछा कि क्या ससुराल वाले लड़की को सताते हैं?
वह बोलीं कि नहीं सताते नहीं हैं। वे तो बहुत प्यार से रखते हैं।
हमने पूछा कि क्या ससुराल वाले लड़की को लेने नहीं आते?
अम्मी साहिबा ने बताया कि लेने के लिए भी वे अक्सर आते रहते हैं लेकिन हम ही नहीं भेजते।
हमने पूछा क्यों?
बोलीं कि वे इस लड़की से कहते हैं कि तुम हमारी बहू हो। बहू की तरह ज़ेवर और भारी कपड़े पहनकर रहा करो। हमारी लड़की को ज़ेवर और भारी कपड़ों की आदत नहीं है। इसलिए यह वहां जाना नहीं चाहती।
हमने कहा कि अगर आपने दूसरी जगह इस का निकाह कर दिया और उन्होंने इसे प्यार न दिया तो फिर आप क्या करेंगी? ये लोग इसे प्यार और इज़्ज़त देते हैं लिहाज़ा यहां से इसे तलाक़ न दिलाएं। अपनी बेटी को समझाएं और इसे इसकी ससुराल रूख़सत करें। आपस में तालमेल बैठाने के लिए समझदारी और मुहब्बत से काम लें। हालांकि हम इस वेलनेस कोचिंग की फ़ीस लेते हैं लेकिन हमने इनसे एक रूपया नहीं लिया। आने जाने का किराया तक ख़ुद हमने अपना ख़र्च किया।’-हकीम साहिब ने बताया।
हमने कहा-‘आपने बहुत नेक सलाह दी और चांदी चाचा के साथ उनकी बहन का घर भी बचा लिया, अल्हम्दुलिल्लाह!’
हकीम साहिब बोले-‘मियां हम कौन हैं बचाने वाले, वह अल्लाह है बचाने वाला। जिसे वह बचाना चाहता है, उसके लिए बचने के असबाब बना देता है। यह ज़मीनो आसमान उसी का मुल्क है और इसमें उसी का हुक्म चलता है।’
हकीम साहिब ने ख़ुद को भी हलाक होने से बचाया और हमारे अक़ीदे की इस्लाह भी कर दी।
हमने कहा कि और वह तीसरा काम कौन सा था हकीम साहिब?
हकीम साहिब बच्चे की तरह हमें ताकने लगे। बोले बता दूं?
हमने कहा-‘क्यों, यह आप क्यों पूछ रहे हैं?’
हकीम साहिब बोले-‘उस वाक़ये का ताल्लुक़ नीयत और तसव्वुर से है। अब तक की बातें तो आपका रीज़निंग माइंड समझ लेगा लेकिन तीसरा वाक़या आपके सिर पर से गुज़र सकता है।’
हमने कहा कि हमारे सिर से गुज़र भी गया तो ऊपर नीम है। वह उस नीम में जाकर अटक जाएगा।
वह और हम साथ साथ क़हक़हा मार कर हंसने लगे।
ज़रा हकीम साहिब की हंसी कम हो और वह बताने की हालत में आएं तो हम उनसे सुनेंगे ‘तसव्वुर की ताक़त का करिश्मा’

Thursday, March 17, 2016

Allahpathy अल्लाह का शुक्र कीजिए अपनी तकलीफ़ें दूर करने के लिए

एक सच्चा कि़स्सा, प्रेरक घटना
जैस्मीन ने अपनी सहेली की सलाह पर हमसे काॅन्टेक्ट किया। 

उसने हमें बताया कि वह बहुत दुखी है। उसने हमें अपने शौहर के बर्ताव और उसकी आदतों के बारे में बताया, जिनसे वह दुखी थी। हमने कहा कि हम आपको गाइडेन्स देंगे और आप इस अज़ाब से निकल आएंगी, इन्-शा अल्लाह!
परसों रात यानि 2 फ़रवरी 2016 की रात को 1ः20 पीएम पर, जैस्मीन ने व्हाट्स एप पर मैसेज करके कहा कि देखिए मौलाना साहब! यह वक़्त हो रहा है और वह अभी तक घर नहीं आए। रोज़ ही घर लेट आते हैं। मैं आपको यह बात बताना भूल गई थी कि उनकी सबसे बड़ी आदत यह है।’
कल जैस्मीन ने काॅल करके माफ़ी चाही कि साॅरी मौलाना साहब, मैंने आपको इतनी रात में मैसेज करके परेशान किया, लेकिन मैं आपको बताना चाहती थी कि मेरी सबसे बड़ी प्राॅब्लम यह है कि वह देर रात को घर लौटते हैं।
मैंने कहा कि जैस्मीन, यह तुम्हारी सबसे बड़ी प्राॅब्लम तो क्या, यह तुम्हारी सबसे छोटी प्राॅब्लम भी नहीं है लेकिन तुम अपने इसे अपने एटीटयूड की वजह से प्राॅब्लम समझ रही हो। हक़ीक़त यह है कि प्राॅब्लम तुम्हारे दिमाग़ में है।
जैस्मीन बोली-‘मैं समझी नहीं।’ 
मैंने कहा कि इसी मुल्क में ऐसी औरतें हैं, जिनके शौहर फ़ौजी हैं और वे मुल्क की सरहदों पर ड्यूटी दे रहे हैं। वे छः महीने में घर आते हैं। अगर उनके शौहर रोज़ घर आने लगें लेकिन रात को डेढ़ दो बजे घर लौटें तो वे इस पर ख़ुश होंगी कि डेढ़ दो बजे की कोई बात नहीं, अपना शौहर रोज़ रात को घर तो आ जाता है।
यह सुनकर जैस्मीन बेइखि़्तयार क़हक़हा लगाकर हंस पड़ी और फिर काफ़ी देर तक हंसती ही रही।
जैस्मीन बोली कि मेरी सहेली ने आपके बारे में सही कहा था कि आपसे अपनी परेशानी बताने के बाद वह परेशानी ही नहीं लगती।
मैंने फिर उसे एक मिसाल और दी। मैंने कहा कि जिन औरतों के शौहर सऊदी अरब हैं। वे साल में एक बार घर आते हैं। उनकी बीवियां इस बात पर बहुत ख़ुश होंगी, अगर उनके शौहर का काम यहीं लग जाए और वे रोज़ रात को घर आ जाया करें। वे कहेंगी कि अगर उनके शौहर तीन बजे भी आया करें तो यह उनके लिए ख़ुशी की बात होगी।
जो बात उनके लिए ख़ुशी की होगी, वही बात तुम्हें दुख दे रही है। एक ही बात एक को ख़ुशी और दूसरे को ग़म क्यों दे रही है?, 
सिर्फ़ इसलिए कि उस बात को लेकर दोनों का नज़रिया और एटीट्यूड अलग अलग है।
सो अपने मियां को वक़्त का पाबन्द करने का ख़याल छोड़ दो और और उसकी शिकायत भी छोड़ दो। उसकी इस बात पर अल्लाह का शुक्र अदा करो कि तुम्हारा शौहर रोज़ रात को अपने घर आ जाता है।
जैस्मीन हंसे ही जा रही थी। मुझे भी हंसी आने लगी और हंसते हंसते ही जैस्मीन ने काॅल ख़त्म करने की इजाज़त चाही। उसने सलाम किया और बात पूरी हुई।
यह है अल्लाहपैथी का करिश्मा। अल्लाहपैथी कहती है कि हर बात को आप दो पहलुओं से देख सकते हैं।
1. शिकायत का पहलू
2. शुक्र का पहलू
जब आप किसी बात को शिकायत के पहलू से देखते हैं तो आप अज़ाब (कष्ट) महसूस करते हैं।
और जब आप उसी बात को शुक्र के पहलू से देखते हैं तो आप को ख़ुशी महसूस होती है। ख़ुशी की हालत में अज़ाब महसूस नहीं हो सकता क्योंकि जो दो चीज़ें एक दूसरे के खि़लाफ़ हों, वे एक वक़्त में एक ही जगह जमा नहीं हो सकतीं। जैसे कि रात के वक़्त दिन मौजूद नहीं हो सकता।
अब आपका काम यह चुनाव करना है कि आप बात को किस पहलू से देखते हैं?
इसके बाद अंजाम पहले से तय है।
अगर आप अज़ाब से नजात, कष्ट से मुक्ति चाहते हैं तो हर बात को शुक्र के पहले से देखने की ‘आदत’ डेवलप कीजिए। अज़ाब दूर हो जाएगा।
अल्लाह ने क़ुरआन में अपने इसी क़ानून की तालीम दी है-
अल्लाह तुम्हें अज़ाब क्यों देगा अगर तुम उसका शुक्र करते हो और उस पर ईमान रखते हो, अल्लाह शाकिर और अलीम है।

Saturday, February 6, 2016

जानिए, हिफ़ाज़त के लिए क्या ज़रूरी है? Al-Hafeez, Allahpathy

अल्लाह तआला ने कहा है कि
‘व-अम्मस्-साइला फ़-ला तन्हर’
यानि ‘और मांगने वाले को झिड़की न देना।’ (क़ुरआन 93,10)
हमने साइल को झिड़क दिया। नतीजा यह हुआ कि घर से बाहर निकले और हमारा एक्सीडेन्ट हो गया।
क़ुरआन की बात के खि़लाफ़ करने का अन्जाम कभी ख़ैर नहीं हो सकता।
‘मन अमिला सालिहन फ़लि नफ़्सिहि व-मन असाआ फ़-अलैइहा’
यानि जो नेकी करता है सो वह अपनी जान (की फ़लाह) के लिए करता है और जो बुराई करता है तो वह भी उसी पर पड़ती है। (क़ुरआन)
हमारी मोटर साइकिल का मडगार्ड और लाइट टूट गई। जिसकी मरम्मत में हमारे छः सौ नब्बे रूपये लग गए।
यह हमारी बुराई थी जो हमारे सामने आ गई।
इसी के साथ बात यह भी थी कि हमारी नीयत नेक थी। सो वह नेकी भी हमारे लिए ढाल बन गई और हमारे ख़राश तक न आई। मोटर सायकिल गिरने से पहले ही हम उससे न जाने कैसे ख़ुद ही उतर कर ज़मीन पर क़दम जमा कर खड़े हो गए। हमें ऐसा लगा जैसे किसी ने हिफ़ाज़त से पकड़ उतारा हो और फिर पूरे इत्मीनान से ज़मीन पर खड़ा कर दिया हो।
किसी सवारी पर बैठते वक़्त हम अल्लाह के नाम ‘या हफ़ीज़ु या सलाम’ हिफ़ाज़त की नीयत से काफ़ी पढ़ते हैं।
सो उस दिन भी पढ़े थे। यह भी एक नेकी थी।

हर फ़जऱ् नमाज़ के बाद हम आयतुल-कुर्सी भी पढ़ते हैं। 
सुबह शाम और भी कुछ दुआएं हिफ़ाज़त, ग़लबे और बरकत के लिए हम पढ़ते हैं। अल्-हम्दुलिल्लाह!
हमारी नेकियां और बदी मिलकर एक अंजाम की सूरत इखि़्तयार कर गईं। जिसे हमने देख लिया और भुगत लिया।
इस भूमिका के बाद हम आपको कि़स्सा सुनाते हैं कि हक़ीक़त में हुआ क्या था?
आज से तक़रीबन एक साल पहले की बात है। हम आॅफि़स के लिए निकलने की तैयारी कर ही रहे थे कि एक पेशेवर फ़क़ीर दरवाज़े पर आ गया। वह एक टीन एजर था। उसने हरा कपड़ा सिर पर बांध रखा था। हमें बड़ा एहसास हुआ कि वह अभी नई उम्र में ही भीख मांगने के धंधे पर लग गया, जो कि इसलाम में हराम है।
इसी के साथ हमें यह शर्म भी महसूस हुई कि हिन्दू देखेंगे तो क्या सोचेंगे?
हम एक ऐसी काॅलोनी में रहते हैं, जिसमें 97 प्रतिशत हिन्दू भाई रहते हैं। 
हम उन्हें कलिमा ए हक़ पहुंचाते हैं। उसका गश्त इसलाम की छवि को नुक़्सान पहुंचा रहा था। हम ठहरे दाई।
सो हमने उसे समझाया कि भाई तू भीख मांगने का धंधा मत कर। कहीं जाकर केले वग़ैरह का रेहड़ा लगा ले।
वह पूछने लगा कि केले कहां मिलते हैं?
बस हमें ग़ुस्सा ही तो आ गया। पूरे शहर में भीख मांगते हुए घूमता है और पूछता है कि केले कहां मिलते हैं?
हमने कहा कि तू कहां रहता है?
उसने कहा कि बाबा कालेशाह की खि़दमत में रहता हूं।
काला आम चैराहे पर एक बुज़ुर्ग की कच्ची पक्की सी क़ब्र हुआ करती थी। पास में कोर्ट और सरकारी आॅफि़स बहुत हैं। गांव से आने वाले देहाती ज़रूरतमन्द उनकी क़ब्र पर खड़े होकर दुआ कर लेते थे। वक़्त के साथ भीड़ बढ़ी तो जाति से फ़क़ीर बने हुए लोगों ने उसे चन्दे से सजा दिया और उसे पक्के मज़ार की शक्ल दे दी। वहां लाखों रूपये सालाना का चढ़ावा आने लगा। वह एक बिज़नेस प्वाइंट बन गया। 
हम उधर से गुज़रते हैं तो हम शरई तरीक़े से सलाम करके ईसाले सवाब ज़रूर करते हैं और बस।
अब इस मज़ार पर हमारे देखते ही देखते साल में दो बार उर्स भी होने लगे और पब्लिक को भाने वाली क़व्वालियां भी होने लगीं। औरत-मर्द अदाकार और कलाकार भी आने लगे। चीफ़ गेस्ट प्रशासन के अधिकारी होते हैं। अनपढ़ फ़क़ीर इस दरगाह के सज्जादे हैं, वह उनकी बग़ल में बैठते हैं। 
हमने पूछा कि तुझे नमाज़ की दुआएं याद हैं?
वह चुप रहा।
हमने कहा कि तुझे नमाज़ याद नहीं है तो तू बाबा कालेशाह की खि़दमत में क्यों रहने लगा, जबकि उन्होंने तुझसे कभी कहा नहीं कहा अपनी खि़दमत में रहने के लिए?
वह चुपचाप टुकुर टुकुर हमें देखने लगा।
हमारा ग़ुस्सा और ज़्यादा भड़क गया।
हम घर के अन्दर से एक डन्डा उठा लाए और आर्य समाजियों के से अन्दाज़ में उसे झिड़कते हुए धमकाया कि यहां से फ़ौरन भाग जा। फिर कभी यहां नज़र आया तो ठीक नहीं होगा।
वह नौजवान वहां से चला गया।
उसके जाते ही हमारे दिल में खटक हुई कि हमसे ज़रा सी चूक हो गई है। हमें उसे समझाना तो चाहिए था लेकिन झिड़कना नहीं चाहिए था।
बहरहाल हम तैयार होकर घर से बाइक पर निकले। रोड क्राॅस करके कोर्ट के गेट में दाखि़ल हुए। स्पीड 10 किमी. जैसी मामूली रही होगी। एक आदमी सामने आ गया। हाॅर्न ख़राब था। बचाने के चक्कर में बाइक पर से क़ाबू जाता रहा और वह फिसलते हुए आगे को घिसटी और सामने खड़ी एंगल राॅड में जा टकराई।
अल्लाह के यूनिवर्सल लाॅ पक्षपात नहीं करते। वे दाई-ग़ैरदाई और हिन्दू-मुस्लिम नहीं देखते।
जिसकी नीयत और आमाल का जोड़-घटा होकर जो कुल अंजाम बन रहा होता है। वह सूरते हाल उसे पेश आ जाती है।
इस तरह के वाक़यात हम सबकी जि़न्दगी में पेश आते हैं। जिनसे क़ुरआन का हक़ होना साबित होता रहता है और यह भी कि क़ुरआन ने हर उस बात से हमें आगाह कर दिया है, जिससे नुक़्सान हो सकता हो।
लिहाज़ा हम सबको अल्लाह की हिदायत ‘क़ुरआन’ के बताए तरीक़े पर पूरी होशमन्दी से चलना चाहिए। इसी में हमारी सलामती और फ़लाह है।
यह हमारा तजुर्बा है।
अल्-हम्दुलिल्लाह!