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Allahpathy:THE BLESSING MONEY BAG THAT WOULD HELP EVERYONE TO BE RICH IN THE MONTH OF RAMADAN

By Hazrat Hakeem Mohammad Tariq Mahmood Chughtai Dear Readers! I Bring to you precious pearls and do not hide anything, you shou...

Saturday, August 1, 2015

आजकल कई वजहों से बाल उम्र से पहले ही सफ़ेद हो जाते हैं। लड़कियों के बाल सफ़ेद हो जाएं तो लड़कियों के साथ उनकी मांएं भी चिंतित हो जाती हैं। एक राज़ की बात आज आपको बताई जा रही है। इसे आज़माइये और इसका जादू असर देखिए।
इस दौरान तली हुई और खट्टी चीज़ों का परहेज़ करें।

1. नीम का तेल नाक के नथुनों में चंद क़तरे रोज़ाना टपकाएं आपके बाल अगर उम्र से पहले सफ़ेद हो गए हैं तो वे काले हो जाएंगे।
2. नीम के हरे पत्तों का रस नाक में टपकाने से सिरदर्द दूर होता है और कान में टपकाने से कान के दर्द में आराम मिलता है।
3. दाद वाली जगह पर लगाने से दाद दूर हो जाता है।
4. नीम के पत्ते पीसकर शहद में मिलाकर घाव पर लगाया जाए तो जो घाव किसी तरह ठीक न होता हो, वह इस मरहम से ठीक हो जाएगा।
5. नीम की दातुन करने से आप दांतों और मसूड़ों की बीमारियों से मुक्ति पा जाएंगे।
जिसे फ़ायदा हो वह यहां आकर ज़रूर बताए ताकि दूसरे भी इसका इस्तेमाल करने की प्रेरणा पाएं।

मनुष्य की प्रजनन क्षमता बढ़ाने में रेड मीट मददगार garbhdharan

लंदन। मांसाहार पसंद करने वालों के लिए यह एक अच्छी ख़बर हो सकती है। आहार विशेषज्ञों का कहना है कि रेड मीट में मिलने वाला पोषक तत्व प्रजनन क्षमता को बढ़ाता है। उनके मुताबिक़ संतान की चाह रखने वाले दंपतियों के स्वास्थ्य के लिए रेड मीट लाभदायक साबित हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आहार में कुछ चीज़ों की कमी से गर्भधारण करने में समस्या आ सकती है। विटामिन बी 6 ऐसी ही एक चीज़ है। इस विटामिन को प्रजनन और गर्भधारण की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है और रेड मीट में यह पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। इस आधार पर वैज्ञानिकों का मानना है कि रेड मीट का सेवन परिवार बढ़ाने के लिए अहम साबित हो सकता है।
रेड मीट मांस का वह प्रकार है जो कच्चे में लाल रंग का दिखाई पड़ता है और पकने पर सफ़ेद नहीं रह जाता। वयस्क स्तनपायियों के मांस को रेड मीट की श्रेणी में रखा जाता है। आहार विशेषज्ञ कैरी रक्सटन ने कहा कि उम्रदराज़ महिलाएं प्रजनन क्षमता को रेड मीट से जोड़कर बताती रही हैं।
दैनिक हिन्दुस्तान दिनांक 13 जनवरी 2014 अंतिम पृष्ठ

हरेक समस्या का अंत, तुरंत Instant Solution for all problems

पशु-पक्षियों की तरह खाने-पीने और प्रजनन की क्रियाएं मनुष्य भी करता है। उनकी तरह मनुष्य भी अपनी, अपने परिवार की और अपने समूह की देखभाल करता है। इन बातों में समानता के बावजूद पशु-पक्षियों से जो चीज़ उसे अलग करती है, वह है उसकी नैतिक चेतना। पशु-पक्षियों में भी भले-बुरे की तमीज़ पाई जाती है लेकिन एक तो वह मनुष्य के मुक़ाबले बहुत कम है और दूसरे वह उनके अंदर स्वभावगत है यानि कि अगर वे चाहें तो भी अपने स्वभाव के विपरीत नहीं कर सकते जबकि मनुष्य में भले-बुरे की तमीज़ भी बहुत बढ़ी हुई होती है और उसे यह ताक़त भी हासिल है कि वह अपने स्वभाव के विरूद्ध जाकर बुरा काम भी कर सकता है।
भले-बुरे का ज्ञान और उनमें चुनाव का अधिकार ही मनुष्य की वह विशेषता है जो कि उसे पशु-पक्षियों से अलग और ऊंची हैसियत देती है।
मनुष्य सदा से ही समूह में रहता है और समूह सदैव किसी न किसी व्यवस्था के अधीन हुआ करता है। हज़ारों साल पर फैले हुए मानव के विशाल इतिहास को सामने रखकर देखा जाए और जिन जिन व्यवस्थाओं के अधीन वह आज तक रहा है, उन सबका अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि इन सभी सभ्यताओं में एक नियम प्रायः समान रहा है कि ‘जो व्यवहार मनुष्य अपने लिए पसंद नहीं करता, उसे वह व्यवहार दूसरों के साथ भी नहीं करना चाहिए।‘
मनुष्य की नैतिक चेतना में उतार-चढ़ाव के साथ साथ इस नियम का स्थान कभी प्रमुख तो कभी गौण होता रहा है और कभी कभी ऐसा भी हुआ कि शक्ति संपन्न समुदाय ने इस नियम की अवहेलना भी की लेकिन तब भी इस नियम का पालन वे अपने वर्ग में अवश्य करते रहे। इस नियम की पूर्ण अवहेलना कोई न कर सका है और न ही कर सकता है। इसकी पूर्ण अवहेलना का मतलब है पूर्ण अराजकता। जिसका नतीजा है मुकम्मल तबाही।
आस्तिक और नास्तिक, पूर्वी और पश्चिमी, सभी लोग इस नियम को स्वीकारते रहे हैं। नैतिकता का द्वार यही है। इसमें प्रवेश किए बिना मनुष्य शांति में प्रवेश नहीं कर सकता। सभ्यता की स्थिरता और उसकी उन्नति का द्वार भी यही है। मनुष्य कहलाने का हक़दार भी वही है जो कि इस नियम को मानता है। जो इस नियम को नहीं मानता, वह पशुओं से भी बदतर है और उसके असामाजिक होने में कोई शक नहीं है। लोगों ने इसे केवल व्यक्तिगत रूप से ही नहीं बल्कि सामूहिक रूप से भी स्वीकार किया है। इसके बावजूद ऐसा बहुत कम हुआ जबकि किसी सभ्यता ने इस नियम का पालन किया हो। ज़्यादातर इस नियम का पालन व्यक्तिगत सतह पर ही हुआ है और व्यक्तिगत सतह पर भी ऐसे लोग बहुत ही कम हुए हैं जिन्होंने इस नियम का पालन इसकी संभावनाओं के शिखर तक किया हो लेकिन जिन्होंने किया है मानवता ने उन्हें सदा ही एक आदर्श का दर्जा दिया है।
ऐसा क्यों हुआ कि एक सिद्धांत को उसके ठीक रूप में जान लेने के बाद भी अक्सर लोग उसका पालन न कर सके ?
इस बात पर ग़ौर करते हैं तो यह हक़ीक़त सामने आती है कि मनुष्य के अंदर भविष्य की चिंता और सुख की इच्छा भी मौजूद है। उसके अंदर डर और लालच जैसे जज़्बात भी पाए जाते हैं। उसके अंदर ईष्र्या और क्रोध की लहरें भी जब-तब उठती रहती हैं। उसके अंदर ज्ञान के साथ अज्ञान और विवेक के साथ जल्दबाज़ी भी पाई जाती है। वह केवल अपने लाभ-हानि के आधार पर सोचता है और किसी भी हाल में वह नुक्सान नहीं उठाना चाहता। यही वजह ह�� कि वह भला काम तभी तक करता है जब तक कि उसे उसमें लाभ नज़र आता है लेकिन जब उसे भला काम करने में नुक्सान नज़र आता है तो वह भला काम छोड़ बैठता है। मनुष्य बुरे काम से तभी तक बचता है जब तक कि उसे बुरे काम से बचने में लाभ नज़र आता है लेकिन जब उसे बुरा काम करने में लाभ नज़र आने लगता है तो वह बुरा काम करता है। लाभ का लालच और नुक्सान का डर मनुष्य को भले काम करने की प्रेरणा भी देते हैं और यही जज़्बात उसे भलाई के काम करने से रोक भी देते हैं।
भलाई के काम में नुक्सान और बुराई के काम में लाभ होता देखकर भी जिन लोगों ने भलाई का रास्ता नहीं छोड़ा, उन्हें बहुत नुक्सान उठाना पड़ा। अक्सर उन्हें बेदर्दी से क़त्ल कर दिया गया, उनके परिवार को तबाह कर दिया गया, उनके साथियों की भी बड़ी बेदर्दी से हत्याएं की गईं। उनकी क़ुर्बानियां देखकर लोगों ने उन्हें महान और आदर्श तो घोषित कर दिया लेकिन उनके रास्ते पर चलने की हिम्मत अक्सर लोग न जुटा सके।
यह एक बड़ी विडंबना है कि मनुष्य जाति भले-बुरे की तमीज़ भी रखती है और उसका पालन करके दिखाने वाले आदर्शों की भी उसके पास कमी नहीं है लेकिन फिर भी मनुष्य उस रास्ते से हटकर चल रहा है। दुनिया भर की सभ्यताएं आज जितनी भी समस्याओं से दो चार हैं, उनके पीछे मूल कारण यही है।
इसी की वजह से मानव जाति बहुत से टुकड़ों में बंटी और फिर उसने एक धरती के बेशुमार टुकड़े कर डाले। उसने धरती ही नहीं बल्कि पानी भी बांट और फिर आकाश भी बांट डाला। जब वे ख़ुद बंट गए तो फिर उनमें संघर्ष भी हुआ और हार-जीत भी हुई। हार जाने वालों पर ज़ुल्म भी हुए और जीतने वालों से नफ़रत भी की गई और फिर ऐसा भी हुआ कि समय के साथ जीतने वाले कमज़ोर पड़ गए तो दबाकर रखे गए लोगों ने उन्हें पलट डाला और उन पर उन्होंने उनसे भी बढ़कर ज़ुल्म किए। बंटवारे और संघर्ष की इसी रस्साकशी में भयानक हथियार बनाए गए। उसने अपनी रोटी का पैसा हथियार बनाने में ख़र्च किया और आज आलम यह है कि हथियारों की मद में जो देश जितना ज़्यादा पैसा ख़र्च करता है, वह उतना ही ज़्यादा विकसित समझा जाता है। हथियारों पर ख़र्च होने वाला दुनिया का पैसा लोगों की रोटी, शिक्षा और चिकित्सा पर ख़र्च होता तो यह दुनिया आज स्वर्ग सी सुंदर होती।
जब यह रक़म अपनी जेब से ख़र्च करना मुश्किल हो जाता है तो फिर ये विकसित देश कमज़ोर देशों के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जबरन करने लगते हैं और अपने लालच का विरोध करने वालों को तबाही का डर दिखाते हैं और डर कर समर्पण न करने वालों को सचमुच ही तबाह कर डालते हैं। इस तरह हिंसा-प्रतिहिंसा और संघर्ष की एक बहुचक्रीय प्रक्रिया जन्म लेती है जो एक लंबे अर्से से चली आ रही है और यह ख़त्म होगी भी नहीं जब तक कि मनुष्य जाति सामूहिक रूप से उस नियम को अपने आचरण से मान्यता नहीं देगी जिसे वह सदा से जानती है कि दूसरों से वह व्यवहार हरगिज़ नहीं करना चाहिए जिसे अपने लिए पसंद नहीं किया जा सकता।
लेकिन सवाल यह है कि वह कौन सा तरीक़ा है जो मनुष्य को इस बात के लिए तैयार कर सके कि चाहे वह तबाह ही क्यों न हो जाए तब भी उसे बुरा काम और मानव जाति का बंटवारा और रक्तपात किसी भी हाल में नहीं करना है, उसे इस धरती पर सदा शांति से ही रहना है, सामूहिक हितों के लिए उसे व्यक्तिगत हितों की क़ुर्बानी देते हुए ही जीना चाहिए और अगर इस रा���्ते में उसे मौत भी आ जाए तो उसे मौत को स्वीकार लेना चाहिए लेकिन भलाई के रास्ते से नहीं हटना चाहिए।
लोग पूछ सकते हैं कि जब वे मर ही जाएंगे तो फिर इस दुनिया में शांति रहे या नहीं, उसे इससे क्या फ़र्क़ पड़ने वाला है ?
तब क्यों न वह अपने जीवन की परवाह और रक्षा करे, चाहे इसके लिए उसे सामूहिक हितों को ही क्यों न क़ुर्बान करना पड़े ?
आज सामूहिक हितों पर इसीलिए चोट की जा रही है और नतीजा यह है कि सभी बर्बाद हो रहे हैं। डर और आशंका से कोई दिल आज ख़ाली नहीं है।
इन्हीं डर और आशंकाओं के चलते निजी हित के लिए जीने वाले लोगों ने अपने से मिलते जुलते लोगों के साथ मिलकर गुटबंदी कर ली है और फिर अपना अपराध बोध कम करने के लिए साक्ष्य, तर्क और प्रमाण भी जमा कर लिए हैं। इस तरह बहुत से दर्शन भी वुजूद में आ चुके हैं। जिसे जहां लाभ मिल रहा है वह उसी गुट के दर्शन का क़ायल हो रहा है। कहीं पूंजीवाद है तो कहीं जनवाद है। कहीं नास्तिकवाद है तो कहीं अध्यात्मवाद। हरेक वाद बहुत से नए विवाद को जन्म दे रहा है। नए नए दर्शन लेकर लोग मसीहाई का स्वांग रच रहे हैं। कोई राजनीतिक रूप से मुक्ति का झूठा दावा करके निजी हित साध रहा है और कोई आत्मा की मुक्ति के उपाय बता रहा है। मुक्ति की जितनी कोशिशें की जा रही हैं, पाश और बंधन उतने ही ज़्यादा बढ़ते जा रहे हैं। इनसे मुक्ति की कोशिश में प्रबुद्ध वर्ग वर्जनाएं और मर्यादा तक को तोड़कर देख रहा है कि शायद इन्हें तोड़कर ही कुछ सुकून मिल जाए।
ज्यों ज्यों दवा की जा रही है मर्ज़ बढ़ता ही जा रहा है। विश्वास करके छले जाने के बाद अब विश्वास करने का रिवाज भी कम होता जा रहा है। मनुष्य जाति अपने स्वाभाविक गुणों से धीरे-धीरे रिक्त होती जा रही है। लोग विश्वास न करके भी बर्बाद हो रहे हैं और जो विश्वास कर रहे हैं वे भी छले जा रहे हैं, ठगे जा रहे हैं। जिन लोगों को वे अपना नेता और मार्गदर्शक चुनते हैं वही उन्हें धोखा दे रहे हैं, इस देश में भी और उस देश में भी।
ज़्यादातर लोग तो ऐसे हैं कि वे अपने जज़्बात के क़ब्ज़े में हैं। जो मन में आया कर डाला। जायज़-नाजायज़ और मर्यादा का ख़याल ही ख़त्म कर लिया और कुछ लोगों ने इनसे नुक्सान होता हुआ देखा तो इन जज़्बात की जड़ ही काट दी। न विवाह किया, न बच्चे पैदा किए और न ही समाज के दुख में दुखी और उसकी ख़ुशी में ख़ुश हुए और समझा कि उन्होंने मनुष्य के स्वाभाविक गुणों को नष्ट करके कोई बहुत बड़ा काम कर दिया। उन्हें अपना आदर्श समझने वाले भी उनके रास्ते पर चले और इस तरह समाज में दो अतियां वुजूद में आ गईं जबकि बेहतर था कि जज़्बात को सिरे से ही कुचल डालने के बजाय उन्हें नियंत्रित करने की कोशिश की जाती। लाभ के लिए उनसे काम लिया जाता और नुक्सान की जगह उन्हें क़ाबू किया जाता।दो अतियों के बीच का यही मध्यमार्ग वास्तव में ऐसा है जिसका पालन सभी से संभव है।
जो सबके लिए कल्याणकारी हो, उसकी स्थापना की कोशिश ही मनुष्य के लिए व्यवहारिक है। एक-दो या चंद आदमी कुछ भी कर सकते हैं, उनका मार्ग बस उनके के लिए ही है। सारी दुनिया की सभ्यता के लिए वही मार्ग है जो दुनिया को तोड़ने के बजाय सारी दुनिया को जोड़ने की बात करे। जो जज़्बात में बहने के बजाय या उन्हें मिटाने के बजाय ���न्हें क़ाबू करना सिखाए। जिस पर हरेक देश-काल और इलाक़े के मर्द-औरत हरेक आयु में चल सकें, बचपन में भी, जवानी में भी और बुढ़ापे में भी। ऐसे मार्ग पर चलने वाला आदमी ही ऐसी व्यवस्था दे सकता है जो कि सभ्यता की समस्याओं का सच्चा समाधान हो।
मानव जाति के इतिहास में ऐसे बहुत से आदमी समय समय पर हुए हैं और हरेक इलाक़े में हुए हैं। उनमें से कुछ का इतिहास भी कम या ज़्यादा आज हमारे पास सुरक्षित है, जिसके द्वारा हम जानते हैं कि तमाम विपरीत हालात के बावजूद उन्होंने अपनी नैत��क चेतना से हटकर कभी कोई काम नहीं किया। जो आदमी उनके प्रभाव में आया उसने भी नुक्सान उठाना गवारा किया लेकिन भलाई की राह से हटना गवारा न किया। उन्होंने लोगों को अपने डर, लालच, ग़ुस्से और जलन को क़ाबू करने का क्या उपाय बताया ?
उन्होंने वह कौन सा लाभ बताया जिसे पाने के लिए आदमी दुनिया का हरेक नुक्सान उठाने के लिए ख़ुशी ख़ुशी तैयार हो जाता है। यह जानना आज बहुत ज़रूरी है।
ऐसा नहीं है कि इन महान हस्तियों के बारे में लोग नहीं जानते या इनका नाम नहीं लेते लेकिन बस नाम भर ही लेते हैं या उनके जैसे कुछ काम करते भी हैं तो बस केवल कुछ ही काम करते हैं और बहुत कुछ छोड़ देते हैं। ये लोग आज उनके प्रतिनिधि के तौर पर जाने जाते हैं लेकिन इन लोगों की हालत भी यही है कि इन महापुरूषों की जिस बात को मानकर लाभ मिलता उसे तो वे मान लेते हैं और जिस बात को मानकर नुक्सान होता है उसे छोड़ बैठते हैं। दरअसल ये चाहे उनके जैसे कुछ काम कर रहे हों लेकिन चल रहे हैं ये भी डर और लालच के उसी उसूल पर जिस पर कि उन महापुरूषों को न मानने वाले चल रहे हैं। ऐसे लोग समाज में न मानने वालों से ज़्यादा समस्याएं पैदा कर रहे हैं।
इन महापुरूषों का वास्तविक प्रतिनिधि केवल वह है जो कि हर हाल में उनके मार्ग पर चलता है। उनकी मंशा से भी केवल वही आदमी सही तौर पर वाक़िफ़ है। ऐसे आदमियों का वुजूद हमारे बीच आज भी है, जिससे पता चलता है कि उम्मीद की किरण अभी बाक़ी है। बुराई का दौर रूख़सत हो सकता है और भलाई का दौर आ सकता है। आज इंसान भले ही जानवर से बदतर हालत में जी रहा हो लेकिन वह अपने अधिकार से काम ले तो फिर से इंसान बन सकता है। एक ऐसा इंसान जो कि बुराई से हर हाल में बचता है और भलाई की राह चलता है।
सामूहिक रूप से यह हालत समाज में जब भी आए लेकिन व्यक्तिगत रूप से आदमी जब चाहे यह हालत पा सकता है। 
समूह जो चाहे वह करे लेकिन व्यक्ति को सदैव वही करना चाहिए जो कि हक़ीक़त में सच और सही है, जो कि वास्तव में उसके जीवन का मर्म है क्योंकि मानव का यही धर्म है। इसी मार्ग पर चलकर इंसान ख़ुद को भटकने बचा सकता है, केवल इसी तरीक़े से वह अपनी ख़ुदी को रौशन कर सकता है और ऐसे ही लोगों को देखकर इंसान सदा से सद्-प्रेरणा पाते आए हैं। 
समय समय पर महापुरूष आए और ‘अपना कर्म‘ करके चले गए। अब महापुरूषों की इस पावन भूमि पर आप हैं। सद्-प्रेरणा लेना-देना और सत्कर्म करना अब आपकी ज़िम्मेदारी है। देखिए कि आप क्या कर रहे हैं ?
इसी आत्मावलोकन से हरेक समस्या का अंत आप कर सकते हैं तुरंत।
इंसान का असल इम्तेहान यही है कि वह अपने ज्ञान और अपनी ताक़त का इस्तेमाल क्या करता  है ?

माँ को घर से हटाने का अंजाम औलाद की तबाही Mother Care

मिसालः‘आरूषि-हेमराज मर्डर केस’
आज दिनांक 26 नवंबर 2013 को विशेष सीबीाआई कोर्ट ने ‘आरूषि-हेमराज मर्डर केस’ में आरूषि के मां-बाप को ही उम्रक़ैद की सज़ा सुना दी है। फ़जऱ्ी एफ़आईआर दर्ज कराने के लिए डा. राजेश तलवार को एक साल की सज़ा और भुगतनी होगी। उन पर 17 हज़ार रूपये का और उनकी पत्नी डा. नुपुर तलवार पर 15 हज़ार रूपये का जुर्माना भी लगाया गया है। दोनों को ग़ाजि़याबाद की डासना जेल भेज दिया गया है। डा. नुपुर तलवार इससे पहले सन 2012 में जब इसी डासना जेल में बन्द थीं तो उन्होंने जेल प्रशासन से ‘द स्टोरी आॅफ़ एन अनफ़ार्चुनेट मदर’ शीर्षक से एक नाॅवेल लिखने की इजाज़त मांगी थी, जो उन्हें मिल गई थी। शायद अब वह इस नाॅवेल पर फिर से काम शुरू कर दें। जेल में दाखि़ले के वक्त उनके साथ 3 अंग्रेज़ी नाॅवेल देखे गए हैं। 

आरूषि का बाप राकेश तलवार और मां नुपुर तलवार, दोनों ही पेशे से डाॅक्टर हैं। दोनों ने आरूषि और हेमराज के गले को सर्जिकल ब्लेड से काटा और आरूषि के गुप्तांग की सफ़ाई की। क्या डा. राजेश तलवार ने कभी सोचा था कि उन्हें अपनी मेडिकल की पढ़ाई का इस्तेमाल अपनी बेटी का गला काटने में करना पड़ेगा?
डा. नुपुर तलवार ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि उसकी जि़न्दगी में कोई ऐसी मनहूस घड़ी आएगी जबकि उसकी पेशेवर सलाहियत उसी की बेटी का गुप्तांग धोने के काम आएगी। दोनों डाक्टर पति पत्नी अपनी बेटी आरूषि से बहुत प्यार करते थे। सीबीआई का भी कहना है कि उन्होंने आरूषि की हत्या इरादतन नहीं की।
डा. राकेश तलवार ने 15 व 16 मई 2008 की दरम्यानी रात को अपने नेपाली नौकर हेमराज को आरूषि के कमरे में ऐसी हालत में देख लिया। जिसे देखकर वह अपना आपा खो बैठे और उस पर एक गोल्फ़ स्टिक से हमला कर दिया। ऐश का सामान तैश में इस्तेमाल किया तो नतीजा यह हुआ कि पहला वार हेमराज के सिर पर लगा लेकिन दूसरा वार उनके हाथ से आरूषि के माथे पर जा लगा और वह मर गई। उसकी मौत को छिपाने के लिए डा. राजेश ने बेटी का गला एक सर्जिकल ब्लेड से काट दिया। गला कटने पर उसकी धमनी से तेज़ी के साथ ख़ून नहीं निकला। यह पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से साबित है। 
हेमराज जि़न्दा रहता तो वह पुलिस को बता सकता था कि आरूषि को उसके बाप ने ही मारा है। सज़ा से बचने के लिए डा. राजेश को हेमराज को भी मारना पड़ा। उसका गला भी उसी सर्जिकल ब्लेड से काट दिया गया। दोनों ने उसकी लाश को छत पर डाल दिया और दरवाज़े पर ताला लगा दिया। दिन निकला तो डा. राजेश तलवार ने अपने नौकर हेमराज को आरूषि के क़त्ल में नामज़द करते हुए पुलिस में रिपोर्ट लिखवा दी। पुलिस ने सीढि़यों पर ख़ून के निशान देखकर उनसे दरवाज़े की चाभी मांगी तो उन्होंने इनकार कर दिया। पुलिस को ताला तोड़ना पड़ा और तब नौकर की लाश उनकी छत पर ही मिल गई। डा. राजेश तलवार ने अपने नौकर की लाश को पहचानने से ही इन्कार कर दिया।
आरूषि का पोस्टमार्टम करने वाले डा. दोहरे पर राकेश तलवार ने भी दबाव डाला कि वह अपनी रिपोर्ट में यौन संबंध की तस्दीक़ न करे। उसके गुप्तांग को पानी से धोने की बात भी सामने आई है। यह काम डा. नुपुर तलवार ने किया था। डा. नुपुर एक अच्छी मां भले ही न बन पाईं लेकिन वह एक अच्छी पत्नी ज़रूर साबित हुईं। वह हर क़दम पर अपने पति का साथ देती रहीं। अगर वह थोड़ा सा सजग रहतीं तो वह एक अच्छी मां भी साबित सकती थीं।

देखने में यह घटना महज़ एक मनहूस हादसा लगती है लेकिन कोई भी हादसा बे-सबब नहीं होता। हक़ीक़त यह है कि इस घटना के असबाब (कारण) मां-बाप ने ख़ुद ही जमा किए हैं। ये असबाब  करोड़ों परिवारों में मौजूद हैं। उन परिवारों में भी ऐसी दुर्घटना संभव है।
क्या हैं वे असबाब ?, वक्त का तक़ाज़ा है कि इस पर ग़ौरो-फि़क्र किया जाए।
सबसे पहला और सबसे अहम सबब है, माॅडर्न सोसायटी में मां के रोल को बदल देना। मां को घर से हटाने का मतलब है बच्चों को बर्बाद कर देना।
मां-बाप औलाद को मिलकर पालते हैं। बाप कमाता है और मां पकाकर खिलाती है। आज भी ज़्यादातर हिन्तुस्तानी घरों में यही होता है। पहले ज़रूरत और मजबूरी में ही औरत घर से बाहर कमाने के लिए निकलती थी। अगर पहले बाप के काम को काम माना जाता था तो मां का काम, काम से ज़्यादा क़ुरबानी माना जाता था।
माॅडर्न लाइफ़ स्टाइल ने उन औरतों को वर्किंग-वूमेन माना है जो सीधे तौर पर रूपया कमाने का कोई काम कर रही हैं। घर पर बच्चों की देखभाल का बहुत बड़ा काम अंजाम देने वाली औरत को हाउस-वाइफ़ यानि घरेलू औरत कह दिया जाता है। मानो वह कोई काम ही न करती हो या उसके काम की कोई ख़ास अहमियत ही न हो। इस तरह बेशक पैसा तो डबल आ जाता है लेकिन बच्चा अधूरा रह जाता है। वह मां के प्यार, उसकी निगरानी और उसकी तरबियत (अच्छे अख़लाक़ और संस्कार) से महरूम ही रह जाता है। 
मां बाप इस कमी की भरपाई के लिए घर में नौकर रख लेते हैं लेकिन कोई नौकर मां का बदल नहीं हो सकता। बच्चा अपना अकेलापन टी. वी. और इन्टरनेट के सहारे दूर करना चाहता है तो पोर्न फि़ल्में उसके मन में बेहयाई और जरायम के बीज बो देती हैं। नई उम्र के बच्चे जो देखते हैं, उसे आज़माने की कोशिश करते हैं। इस तरह मां की ग़ैर-मौजूदगी बच्चों से उनका बचपन छीन रही है।
दूसरा सबब पैसे की हवस है। असल में इसी हवस की ख़ातिर मां के रोल को बदला गया है। जि़न्दगी की ज़रूरतें पूरी होने के बाद भी लोग अपनी दौलत के ढेर को ज़्यादा से ज़्यादा बड़ा कर लेना चाहते हैं। 
तीसरा सबब जहालत है। जिसे हिन्दी में अज्ञान कहा जाता है। अज्ञान गहरा अर्थ रखता है। शिक्षित लोग भी अज्ञानी हो सकते हैं। आरूषि के मां-बाप डाक्टर होने के बावुजूद भी जाहिल अर्थात अज्ञानी ही रह गए।
अकेली कमसिन लड़की के पास एक पुख्ता जवान आदमी को छोड़ने के लिए न तो धर्म कहता है और न ही मनोविज्ञान। उन्होंने न धर्म की मानी और न ही साइंस की। इसी का नाम जहालत है। शराब पीना जहालत है। पुलिस ने डा. राकेश तलवार की डायनिंग टेबल से शराब की बोतल भी बरामद की है। आरूषि के मर्डर के बाद शराब भी पी गई थी। हेमराज भी शराबी रहा हो तो कोई ताज्जुब नहीं। बाप घर में बैठकर शराब पिए और बच्चों से चरित्रवान बनने की उम्मीद करे। इसे भी जहालत में गिना जाएगा। मां-बाप सिर्फ़ रूपया कमाने की मशीन ही नहीं होते बल्कि वे अपने अमल से अपने बच्चों के सामने एक आदर्श भी पेश करते हैं। 
एजुकेशन का मक़सद अगर रूपया और रूतबा कमाना है तो डा. राकेश तलवार और नुपुर तलवार ने यह पा लिया है लेकिन आज उनके पास उनकी बेटी आरूषि नहीं है और वे ख़ुद जेल में हैं तो ये दोनों चीज़ें उनके लिए बेकार हैं।
फिर एजुकेशन का मक़सद क्या है?
एजुकेशन का मक़सद न जानना चैथा सबब है। लोग एजुकेटिड हैं लेकिन वे एजुकेशन का मक़सद नहीं जानते। यही वजह है कि एजुकेशन के साथ साथ क्राइम का ग्राफ़ भी बढ़ रहा है और बड़े क्राइम पढ़े लिखे लोग ही कर रहे हैं।
पांचवा सबब है जि़न्दगी के मक़सद को न जानना। यह पांचवा सबब दरअसल बुनियादी सबब है। जि़न्दगी को आप किस नज़र से देखते हैं, यह बात आपके जीने के तरीक़े को ही बदल देती है। जो लोग जीने का मक़सद और जीने का सही तरीक़ा जानते हैं। वे अपने घर में जवान अजनबी आदमी तो क्या कुत्ता तक घुसने नहीं देते।
लोग जी रहे हैं लेकिन वे नहीं जानते कि जि़न्दगी का मक़सद क्या है?
माॅडर्न सोसायटी ने अपनी जहालत की वजह से मां के रोल के साथ जो छेड़छाड़ की है, उसी का एक भयानक नतीजा है ‘आरूषि-हेमराज मर्डर केस’। इस हादसे के आईने में हम सब अपना जायज़ा ले सकते हैं कि हमारे घर में तो इन असबाब में से कोई मौजूद नहीं है?
बच्चों को पालना है तो अच्छा मां-बाप बनना सीखना होगा। जि़म्मेदार मां-बाप बनने की बातें स्कूल-काॅलेज के सिलेबस में रखी ही नहीं हैं। इसके लिए अपने अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे मां-बाप से ही तालीम लेनी होगी या फिर देखिए उन मां-बापों को, जिन्होंने अपने बच्चों को बिना किसी स्कूल-काॅलेज के ही इतना अच्छा बना दिया कि आज तक दुनिया उनके नक्शे-क़दम पर चलकर कामयाबी हासिल कर रही है। मां-बाप पर कल भी लाजि़म था और उन पर आज भी लाजि़म है कि वे पहले ख़ुद सही और ग़लत की तमीज़ सीखें और फिर अपने बच्चों को सिखाएं।
इसी के साथ ख़ुदग़र्ज़ी से भी निकलना होगा। सिर्फ़ अपने भले के बजाय दूसरों की भलाई के बारे में भी सोचना होगा। सबको सही-ग़लत की तमीज़ देनी होगी। कोई जवान आदमी पैसे और रोज़गार की कमी की वजह से अविवाहित न रहे और न ही किसी विवाहित मर्द को पैसे की ख़ातिर अपने बीवी-बच्चों से दूर जाने के लिए मजबूर होना पड़े। इसकी व्यवस्था करनी होगी। अगर कमज़ोर वर्ग की बुनियादी ज़रूरतें पूरी न हुई तो आप पर किसी भी तरफ़ से मुसीबत का हमला हो सकता है। 
हमारी सुरक्षा हमारे विचार पर निर्भर है। हमारी ख़ुशियां हमारे नज़रिए की देन हैं।

नास्तिकता निराशा से भर देती है Nastik

आज हिंदुस्तान (अंक दिनांक 15 सितंबर 2012) में ख़ुशवंत सिंह जी का लेख पढ़ा। ज़िंदगी की ऐश लेने के लिए जितनी भी ज़रूरी चीज़ें हैं वे सब उनके पास हैं। इसके बावजूद वह ज़िंदगी से आजिज़ आ चुके हैं। वह लिखते हैं-
अब मैं अपनी जिंदगी से आजिज आ गया हूं
खुशवंत सिंह, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार
पिछले 15 अगस्त को मैं 98 साल का हो गया। फिलहाल मेरी सेहत का बुरा हाल है। इसलिए यह कॉलम लिखना बहुत मुश्किल हो गया है। मैं पिछले सत्तर साल से लगातार लिखता रहा हूं। लेकिन अब तो सच यह है कि मैं मरना चाहता हूं। मैंने बहुत जी लिया। अब मैं जिंदगी से आजिज आ गया हूं। आगे देखने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं जो भी जिंदगी में करना चाहता था, उसे कर चुका हूं। तब जिंदगी में घिसटते रहने का क्या मतलब है? वह भी तब, जब करने को कुछ भी न बचा हो। मुझे तो इस दौर में एक ही राहत नजर आती है कि अपनी पुरानी खुशनुमा यादों में खो जाऊं। यों ही फैज याद आते हैं-रात दिल में यूं तेरी खोई हुई याद आए।जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए।जैसे सहराओं में हौले से चले बादे नसीमजैसे बीमार को बेवजह करार आ जाए।मैं सोचता हूं कि किसी लाइलाज शख्स का इलाज क्या है? इसका जवाब है: एक लाश जैसे शरीर के लिए अपनी जिंदगी से विदा हो चुकी महबूबाओं को याद करना। शायद !
निराशा और पीड़ा भरे ये शब्द उनके मुंह से क्यों निकल रहे हैं ?
...क्योंकि उन्होंने ज़िंदगी को अपने तरीक़े से जिया न कि उस तरीक़े से जैसे कि ज़िंदगी देने वाले ने बताया है। अपने तरीक़े से ज़िंदगी जीने वाले की सबसे बड़ी नाकामी यह होती है कि वह कभी नहीं जान पाता कि मौत की सरहद के पार उसके साथ क्या होने वाला है ?
यही चीज़ इंसान को निराशा से भर देती है। नास्तिकता निराशा से भर देती है
ध्यान रहे कि ख़ुशवंत सिंह जी ख़ुद को नास्तिक बताते हैं।

क्या अपाहिज भ्रूणों को मार देने के बाद भी डाक्टर को मसीहा कहा जा सकता है ? 'Spina Bifida'

मेरी बेटी अनम का नाम हिंदी ब्लॉग जगत के लिए एक जाना पहचाना नाम है। हिंदी ब्लॉग जगत में उसकी उम्र के किसी बच्चे का  इतना चर्चा नहीं हुआ, जितना कि उसका हुआ है।
यह ठीक वही वक्त है जब हमने अपनी प्यारी अनम को उसके झूले में मृत पाया था। आज से ठीक एक साल पहले 21 और 22 जुलाई की दरम्यानी रात को जब वह सोई तो हम नहीं जानते थे कि सुबह को उसके पालने से जब हम उसे उठाएंगे तो वह हमें एक बेजान लाश की शक्ल में मिलेगी। महज़ 22 दिन इस दुनिया में रहकर वह चल बसी और अच्छा ही हुआ कि वह चल बसी।
'Spina Bifida' की वजह से वह पैदाइशी तौर पर एक अपाहिज बच्ची थी। उसकी दोनों टांगें बेकार थीं। उसके सिर की हड्डियों के बनने में भी कुछ कमी रह गई थी और उसकी रीढ़ की हड्डी भी तिरछी थी। उसकी पैदाइश से पहले जब लेडी डाक्टर मीनाक्षी राना ने उसकी सेहत को जांचने के लिए अल्ट्रा साउंड करवाया तो ये सब बातें उसकी रिपोर्ट में सामने आ गईं।
डाक्टर मीनाक्षी ने कहा कि इस बच्ची को पैदा नहीं होने देना है, यह अपाहिज है और आपके किसी काम की नहीं है।
हमने पूछा कि यह ज़िंदा तो है न ?
उन्होंने कहा कि हां ज़िंदा तो है।
तब हमने कहा कि वह ज़िंदा है तो हम उसे मार नहीं सकते। ज़िंदगी और मौत के फ़ैसले करने वाला ख़ुदा है और बच्चे को मां के पेट में मार देना भी उसकी नज़र में क़त्ल है। हम अपाहिज बच्चे को पाल सकते हैं लेकिन ख़ुदा को नाराज़ नहीं कर सकते।
उन्होंने ज़बर्दस्त तरीक़े से हमारे फ़ैसले की मुख़ालिफ़त की और पर्चे पर उसे टर्मिनेट करने की सलाह तहरीर कर दी।
ऐसा करते हुए उन्हें बिल्कुल भी डर न लगा, न तो एक औरत की हैसियत से और न ही एक डाक्टर की हैसियत से क्योंकि उन्हें मेडिकल कॉलिजेज़ में यही सिखाया जाता है और क़ानून भी इसे जायज़ क़रार देता है। ऐसे ही औंधे फ़ैसले लिये जाते हैं जब कोई सभ्यता ख़ुदा को भूल जाती है और ख़ुद वह काम करने की कोशिश करती है जो कि केवल ख़ुदा, रब, ईश्वर, अल्लाह, गॉड या इक निरंकार का काम है। जिस काम को अल्लाह ने हराम ठहराया है उसे हमारी सभ्यता ने हलाल और जायज़ कर लिया है। मासूम अपाहिज बच्चों को उनकी मांओं के पेट में मार डालने को जायज़ करने वाले हाइली क्वालिफ़ाईड लोग हैं। ख़ुदा से कटने  के बाद शिक्षा भी सही मार्ग नहीं दिखा पाती।
क्या वाक़ई अपाहिज बच्चों को उनकी मांओं के पेट में ही मार डालना उचित है ?
आखि़र किस ख़ता और किस जुर्म के बदले ?
अनम की पैदाइश ने दुनिया के सामने यही सवाल खड़ा कर दिया। इस सवाल को हमने हिंदी ब्लॉगिंग के ज़रिये दुनिया के बुद्धिजीवियों के सामने रखा और उनके ज़मीर को झिंझोड़ा कि देखिए आपकी दुनिया में यह क्या हो रहा है ?
मिलकर आवाज़ उठाइये और अपाहिज भ्रूणों की जान बचाइये।
हर साल जाने कितने लाख भ्रूण हमारे देश में क़त्ल कर दिए जाते हैं और दुनिया भर में क़त्ल कर दिए जाने वाले भ्रूणों की तादाद तो और भी ज़्यादा है और यह तब तक रूकेगा भी नहीं जब तक कि लोग जीवन के बारे में जीवनकार की योजना को सही तौर नहीं जान लेंगे।
जब अनम पैदा हुई तो हमें पता चला कि हमारे घर में लड़की पैदा हुई है। इस तरह एक कन्या भ्रूण की जान बच गई। लोग केवल कन्या भ्रूण को बचाने की बात करते हैं। यह एक अधूरी बात है। सही और पूरी बात यह है कि हरेक भ्रूण को बचाने की बात करनी चाहिए, चाहे वह भ्रूण कन्या हो या नर, चाहे वह सेहतमंद हो या फिर बीमार और अपाहिज ।
अनम हमारे दरम्यान आई और 22 दिन रहकर चली गई लेकिन वह ऐसे सवाल हमारे सामने छोड़ गई है जिन्हें हल किया जाना अभी बाक़ी है।
जितने भी दिन वह हमारे बीच रही, वह एक अच्छी बच्ची की तरह पेश आई। उसके अंदर ज़बर्दस्त सब्र था। वह मासूम थी। वह इस दुनिया से चली गई। वह इस दुनिया की सख्तियों से बच गई। उसके हक़ में उसका जाना अच्छा ही हुआ। ऐसा हमारे उस्ताद जनाब सय्यद साहब ने फ़रमाया। उनके ख़ुद दो-दो अपाहिज बच्चियां हैं। एक का इन्तेक़ाल तब हुआ जबकि वह 22 साल की हो गई थी। वह अपने बल से हिल भी नहीं सकती थी और न ही वह देख और सुन सकती थी और न ही वह बोल कर अपनी तकलीफ़ ही किसी को बता सकती थी। इसी तरह की एक और बच्ची उनके घर में अभी भी है। अपाहिज बच्चों को पालने में जो व्यवहारिक दिक्क़तें हैं, उन्हें वे ख़ूब जानते हैं। उनकी बातों ने दिल को सुकून दिया।
अनम की मौत पर हिंदी ब्लॉग जगत में भी ज़बर्दस्त दुख मनाया गया। अनगिनत ब्लॉग पर उस मासूम को याद किया गया, उसके लिए दुआ और प्रार्थना की गई। हिंदी ब्लॉगर्स के इस उम्दा बर्ताव ने साबित कर दिया कि हिंदी ब्लॉग जगत से हमदर्दी का जज़्बा अभी रूख़सत नहीं हुआ है।
बहरहाल, वक्त तेज़ी से गुज़र गया और आज फिर वही रात आ पहुंची है जिसकी सुबह हमारे लिए नाख़ुशगवार थी।
...लेकिन अनम तो ख़ुदा की थी, उसने दी थी और उसी ने ले ली। चीज़ जिसकी है हुक्म भी उसी का चलेगा। हम उसके हुक्म पर राज़ी हैं और उस मालिक से दुआ करते हैं कि वह हमें उससे मिलाए, बेहतर हाल में, अपनी रज़ा के साथ और इस तरह कि फिर कभी उससे बिछड़ना न हो।

आमीन ,
या रब्बल आलमीन !

जिन आर्टिकल्स में अनम का ज़िक्र किया गया, उनमें से कुछ ख़ास आर्टिकल्स यहां दिए जा रहे हैं ताकि जो लोग नहीं जानते वे भी इस आंदोलन को जानें, समझें और वे भी अपाहिज भ्रूणों की रक्षा के लिए आवाज़ उठायें और उन लोगों की हिम्मत बढ़ाएं, जो कि किसी अपाहिज बच्चे की परवरिश कर रहे हैं।

जानिए सफलता का अटल विधान Success Guide

हाई स्कूल पास करते ही हमने पूरी जागरूकता के साथ फ़ैसला कर लिया था कि हम नेकी और ईमानदारी के साथ अपनी ज़िंदगी गुज़ारेंगे। बचपन से भी हम यही करते आए थे लेकिन वह एक आदत थी जो मां बाप को और घर के दूसरे लोगों को देखकर ख़ुद ही पड़ गई थी। अब अपनी राह ख़ुद चुननी थी और उस राह के अच्छे बुरे अंजाम को भी ख़ुद ही भोगना था। नौजवानी की उम्र एक ऐसा पड़ाव है, जहां संभावनाओं से भरा हुआ इंसान होता है और उसके सामने हज़ारों रास्ते होते हैं। वह उनमें से किस रास्ते पर चलता है, इसका फ़ैसला भी ख़ुद उसी को करना होता है।

इस उम्र में इंसान के दिल में हज़ारों सपने और हज़ारों ख्वाहिशें होती हैं। इसी के साथ उसकी और उसके परिवार की कुछ ज़रूरतें भी होती हैं और उन्हें पूरी करने की उम्मीदें भी उससे जुड़ी होती हैं। आर्थिक ज़रूरत इनमें सबसे अहम ज़रूरत है। इसे कोई भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। हम बी. एससी. (बायो.) में आए तो हम भी इसे नज़रअंदाज़ न कर सके।
अख़बारों को पढ़कर हमें लगा कि बिना रिश्वत दिए कहीं नौकरी लगेगी नहीं और रिश्वत हम देंगे नहीं। वह हमारे उसूल के खि़लाफ़ था। सो सरकारी नौकरी का ऑप्शन तो बंद ही था। मेडिकल की जो लाइन हमने चुनी थी, उस तक पहुंचने के लिए अभी कई साल दरकार थे। हमारे वालिद साहब हमसे कमाने के लिए बिल्कुल नहीं कह रहे थे लेकिन ज़रूरतों के तक़ाज़े हमें ख़ुद ही दिखाई दे रहे थे।
हमें हुक्म है कि जब भी कोई मुश्किल पेश आए तो क़ुरआन पढ़ो और पैग़ंबर मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का जीवन देखो, उसमें हर मसले का हल मौजूद है।
यह हमारा ईमान है और जब जब हमने ऐसा किया तो पता चला कि हक़ीक़त भी यही है।
अपनी आर्थिक समस्या के हल के लिए जब हमने पैग़ंबर मुहम्मद साहब स. के जीवन का अध्ययन किया तो हमने देखा कि जब वह जवान हुए तो उन्होंने रोज़ी के ज़रिये के तौर पर व्यापार को चुना था। क़ुरआन में भी व्यापार करने की प्रेरणा दी गई है और पैग़ंबर मुहम्मद साहब स. की हदीस में भी यह बयान मिलता है कि अल्लाह ने ज़मीन में दस हिस्से बरकत उतारी है तो नौ हिस्से बरकत व्यापार में रखी है।
हमने व्यापार करने की ठान ली लेकिन व्यापार के लिए दुकान और पूंजी की ज़रूरत पड़ती है। दुकान तो हमारे पास थी लेकिन पूंजी हमारे पास न थी और वालिद साहब से पूंजी मांग भी नहीं सकते थे क्योंकि वह हमारे इस फ़ैसले से सहमत न थे। उन्होंने हमारी पैदाइश से पहले भारी इन्वेस्टमेंट से रेडियो की बड़ी आलीशान दुकान की थी। तब रेडियो की शुरूआत ही हुई थी। तब यह सबसे आधुनिक काम माना जाता था और इसमें अच्छा मुनाफ़ा होता था। इसके बावजूद इस काम में उन्हें भारी नुक्सान हुआ। इसके बाद भी उन्होंने उसमें एक दो काम किए लेकिन उनमें भी नुक्सान ही हुआ और उसके बाद यह मान लिया गया कि ज़रूर दुश्मनों ने कुछ जादू वग़ैरह करके दुकान की बंदिश कर रखी है कि जो भी काम इसमें किया जाए वह सफल नहीं होता।
इसके बाद हमारे चाचाओं ने इसमें काम किया वह भी सफल न रहे। इसके बाद एक और रिश्तेदार जनाब असलम ख़ान ने अपना वक्त काटने की ग़र्ज़ से यह दुकान ले ली। उन्होंने पतंग वग़ैरह का काम बहुत थोड़े इन्वेस्टमेंट से किया और वह काम बहुत चला। हमारे छोटे भाई ने भी उसमें सॉफ़्ट ड्रिंक बनाने का काम शुरू कर दिया तो वह भी ख़ासा चल निकला। गर्मियां ख़त्म होने के साथ ही यह काम भी ख़त्म हो गया लेकिन इस काम ने यह बता दिया कि जादू जैसी कोई चीज़ इस दुकान पर नहीं है। दुकान के अब तक न चलने के पीछे कार्यकुशलता में कमी और ग़लत फ़ैसले जैसी चीज़ें ही रही हैं, जिनका कि ज़िक्र होता भी था।
इसके बाद यह दुकान हमारे चाचा मंसूर अनवर ख़ान साहब के एक दोस्त ने ले ली और उन्होंने इसमें साबुन बेचना शुरू किया। वह काम भी अच्छा चला लेकिन वह दुकान पर क़ब्ज़ा करने का ही मंसूबा बनाने लगे। उनकी योजना का इल्म हुआ तो हमारे वालिद साहब ने उनसे दुकान ख़ाली करवा ली। तब से बरसों गुज़र गए थे दुकान को बंद पड़े हुए लेकिन उसके बाद फिर किसी को दुकान नहीं दी।
इस तरह दुकान तो हमारे पास थी लेकिन यह दुकान शहर के ख़ास बाज़ार में थी और उसमें काम शुरू करने के लिए लाखों रूपये की पूंजी दरकार थी। वह पूंजी हमारे पास न थी। दुकान के लिए पूंजी का इंतेज़ाम हमें अपने ही बल पर करना था।
दुकान के लिए लाखों रूपये की पूंजी का इंतेज़ाम हम कैसे करें ?,
हमारे सामने यही सबसे बड़ी कठिनाई थी जिससे हमें जूझना पड़ा।
तब हमारी वालिदा साहिबा ने हमें अपने पास से 2700 रूपये दिए। हमने उनसे यह रक़म बतौर उधार ले ली लेकिन सन् 1991 में इस रक़म से मुख्य बाज़ार में कोई भी काम करना संभव न था। रक़म भी कम थी और हमें किसी कारोबार का कोई तजर्बा भी न था।
ऐसे में हम क्या काम करें ?
अब हम इस सवाल से जूझ रहे थे।
अल्लाह क़ुरआन के ज़रिये मोमिनों को सीधी राह दिखाता है। यह हमारा ईमान है। क़ुरआन हरेक समस्या का समाधान देता है। ईमान वाले बंदों को जब भी कोई समस्या परेशान करती है तो वे क़ुरआन में उसका हल ढूंढते हैं। हमने भी यही किया। एक रोज़ सुबह को हमने नमाज़े फ़ज्र में यह नीयत की कि ‘ऐ अल्लाह ! आप अपने कलाम के ज़रिये हमारी रहनुमाई फ़रमाइये कि हम किस चीज़ का व्यापार करें ?‘
यह नीयत करके हम इमाम के पीछे खड़े हो गए और पूरी सजगता के साथ क़ुरआन सुनने लगे। क़ुरआन हरेक समस्या का हल देता है। कभी तो यह हल बिल्कुल स्पष्ट होता है और कभी यह संकेत के रूप में होता है। इसलिए अपना पूरा ध्यान क़ुरआन पर एकाग्र करना होता है।
अगर नमाज़ का वक्त न हो तो पाक साफ़ होकर अल्लाह से बहुत आजिज़ी और विनम्रता के साथ रहनुमाई की दुआ करके कहीं से भी क़ुरआन खोलकर पढ़ना शुरू कर दिया जाता है, अपनी मुश्किल का हल मिल जाता है।
इमाम साहब ने सूरा ए फ़ातिहा के बाद ‘सूरा ए अबसा‘ पढ़नी शुरू की। हमें अपने सवाल का जवाब मिल गया जैसे ही उन्होंने ये आयतें पढ़नी शुरू कीं-
अतः मनुष्य को चाहिए कि अपने भोजन को देखे, (24) कि हमने ख़ूब पानी बरसाया, (25) फिर धरती को विशेष रूप से फाड़ा, (26) फिर हमने उसमें उगाए अनाज, (27) और अंगूर और तरकारी, (28) और ज़ैतून और खजूर, (29) और घने बाग़, (30) और मेवे और घास-चारा, (31) तुम्हारे लिए और तुम्हारे चौपायों के लिए जीवन-सामग्री के रूप में (32)
हम समझ गए कि अल्लाह हमसे ग़ल्ले का व्यापार करने के लिए कह रहा है।
मौलाना शम्स नवेद उस्मानी साहब रह. अपने वतन आए हुए थे। अल्लाह से अपने निजी मसलों में रहनुमाई तलब करने का यह तरीक़ा हमें उन्होंने ही तालीम किया था। हम उनसे मिलने के लिए गए और हमने उन्हें अपना हाल बताया और यह भी बताया कि हमने आपके बताए तरीक़े से अल्लाह से रहनुमाई का सवाल किया तो यह सूरत हमें सुनवाई गई। हमने बताया कि हमारे पास सिर्फ़ 3 हज़ार रूपये ही हैं और वह भी पूरे नहीं हैं।
यह सुनकर मौलाना शम्स नवेद उस्मानी रह. ने कहा कि ‘3 हज़ार रूपये तो बहुत हैं, अगर महज़ 3 रूपये भी होते तो मैं कहता कि आप तिजारत कीजिए।‘
यह सुनना था कि हमारा हौसला बुलंद हो गया और यक़ीन अपने कमाल को पहुंच गया। नुक्सान का अंदेशा दिल से पूरी तरह जाता रहा। इसके बाद मौलाना उस्मानी साहब रह. सूरा ए अबसा की तफ़्सीर करके हमें बताने लगे कि हमें किन किन चीज़ों का व्यापार करना चाहिए और किस तरह करना चाहिए।
इसी दरम्यान उनकी पत्नी मोहतरमा ख़दीजा आईं। दरवाज़े की आड़ से उन्होंने बताया कि वह घर में सिरदर्द की दवा ढूंढ रही हैं लेकिन उन्हें मिल नहीं रही है। कहां रखी है ?
मौलाना ने उन्हें दवा की जगह बताकर हमसे कहा कि देखो अल्लाह की तरफ़ से यह भी एक इशारा है कि आपको दवा देने का काम भी करना है और वाक़ई जैसा उन्होंने कहा था बाद में वैसा ही हुआ भी।
मौलाना शम्स नवेद उस्मानी साहब रह. से मुलाक़ात के बाद दिल से हर तरह का शक तो रूख़सत हो चुका था लेकिन एक कॉम्पलैक्स अब भी मौजूद था और वह यह था कि हमारे ख़ानदान में बड़े काम करने का रिवाज है। थोड़ी सी पूंजी से ग़ल्ले का छोटा सा काम करना हमारी शान के खि़लाफ़ है।
दरहक़ीक़त इसी एक कॉम्पलैक्स ने हिंदुस्तान के नौजवानों को बेरोज़गार बना रखा है। इसे ‘व्हाइट कॉलर कॉम्पलैक्स‘ के नाम से भी जाना जाता है। हमारे सामने यह ख़ानदानी घमंड के रूप में खड़ा हुआ था। यह एक बहुत मुश्किल मरहला था हमारे लिए लेकिन हमने कलिमा ‘ला इलाहा इल्-लल्ललाह‘ पढ़कर अपने अहंकार को कुचल डाला कि हमारा माबूद तो अल्लाह है, जो उसने कह दिया है, हमें वही करना है, कोई भी चीज़ हमें उसका हुक्म मानने से रोक नहीं सकती।
दुकान में फ़र्नीचर और फ़िटिंग थी ही। हमने उसे अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ करवा लिया। इसके बाद हम सामान ख़रीदने पहुंचे। ख़रीदारी के दरम्यान ही हमें इत्तिला मिली कि हमारी नानी का इंतेक़ाल हो गया है। हम सारा सामान वहीं छोड़कर अपनी वालिदा वग़ैरह के साथ अपनी ननिहाल पहुंचे। इंतेक़ाल के वक्त नानी के पास अपने ख़र्च के तौर पर जो रूपये थे। वे हमारे मामूओं ने हमारी वालिदा और हमारी ख़ाला को दे दिए। इस तरह हमें अचानक ही 3 हज़ार रूपये और मिल गए। हम वहां से लौटे और हमने ख़रीदारी मुकम्मल की तो लगभग 9 हज़ार रूपये का सामान हो गया। 3 हज़ार रूपये दुकानदार ने हमारी तरफ़ उधार लिख लिए। दुकानदार भी कोई और नहीं था बल्कि परवेज़ चाचा थे जो हमारे चाचा वकील साहब के बहुत गहरे दोस्त थे। उनसे ही हमने ख़रीदारी की और उनसे ही हमने दुकानदारी के तौर तरीक़े सीखे। इतना ही नहीं शुरूआती कुछ दिनों तक वही हमारी दुकान पर बैठे भी।
शहर में हाजी इश्तियाक़ सबसे बड़े ईमानदार दुकानदार माने जाते हैं। परवेज़ भाई उनके ही कुनबे के हैं और इनका काम भी शहर में बहुत बड़ा काम माना जाता है। उनका नाम ही चीज़ के सही होने की गारंटी है। उन्हें बैठा देखकर लोगों ने पूछा कि ‘आप यहां कैसे बैठे हैं ?‘
परवेज़ चाचा ने यही जवाब दिया कि यह दुकान भी हमने ही खोली है।
हमारी दुकान देखकर आस पास के दुकानदार हंसने लगे कि इन्होंने फिर दुकान खोल ली है। जल्दी ही यह फिर बंद हो जाएगी। उनकी व्यंग्य भरी मुस्कुराहट ने हमारे जोश को और ज़्यादा बढ़ा दिया।
दुकान खोलने से पहले हमारी फूफी ने यह भी कहा कि ‘राजा ! इस दुकान को देखकर एक आमिल ने बताया है कि इसकी कड़ियां आड़ी रखी हुई हैं। इसीलिए दुकान नहीं चलती। तुम एक दरवाज़ा गली की तरफ़ भी खोल लो तो दुकान चल जाएगी।‘
हमने जवाब दिया कि ‘आप देखना कि अल्लाह ने चाहा तो यह दुकान आड़ी कड़ियों में ही चलेगी।‘
हमारे आस पास ग़ल्ले के बड़े बड़े व्यापारियों की दुकानें थीं। उनके मुक़ाबले हमारे पास सामान थोड़ा था। कम्पटीशन सख्त था। थोड़े दिन पहले ही एक व्यापारी ने लाखों रूपये लगाकर इसी मार्कीट में ग़ल्ले का काम किया था और उसने घाटा उठाकर दुकान बंद कर दी थी। ख़ुद हमारी दुकान भी बार बार बंद हो चुकी थी। लिहाज़ा उन तमाम रास्तों को बंद करना ज़रूरी था जहां से नुक्सान होने का अंदेशा था।
व्यापार को नुक्सान देने वाली ख़ास चीज़ें हैं-
1. माल उधार बेचना
2. फ़िज़ूलख़र्ची
3. बुरी आदतों वाले लोगों की दोस्ती


बुरी आदत वाला आदमी तो कोई हमारी दोस्ती में न था। लिहाज़ा हमने शुरू की दो बातों पर सख्ती से पाबंदी लगा दी। घर में भी कोई सामान जाता तो नक़द ही जाता।
इसके बाद ज़रूरत यह थी कि ग्राहकों की तादाद बढ़ाई जाए। इसके लिए हमने यह तय किया-
1. हम बासमती चावल या किसी भी चीज़ में मिलावट नहीं करेंगे
2. हम अपना माल बाज़ार भाव से सस्ता बेचेंगे

जैसे जैसे लोगों को पता चलता गया कि हमारे माल में मिलावट नहीं है और वह सस्ता भी है तो दूसरे मौहल्लों से और दूर दराज़ के गांवों से भी ग्राहक आने लगे। जितने ग्राहक आते वे हमसे नेकी और सच्चाई का उपदेश भी लेकर जाते। कोई लड़की आती तो वह सिर पर अपना दुपट्टा पहले ठीक करती, उसके बाद वह दुकान पर क़दम रखती। इस मामले में हमारे छोटे भाई हमसे भी ज़्यादा जोशीले हैं। वह बी. काम. कर रहे थे। हम दोनों सूरज उगने के साथ ही दुकान खोल लेते। बाद में अपने शौक़ की वजह से और कुछ हमारे बड़प्पन की वजह से वही दुकान खोलते और वही ख़रीदारी करते और हम शाम के वक्त दुकान पर जाया करते।
हमारा काम बहुत तेज़ी से बढ़ता चला गया। अब हम अपने शहर से ख़रीदारी करने के बजाय ज़िले की आढ़त से ख़रीदारी करने लगे और फिर एक ज़िले के बजाय दो ज़िलों से ख़रीदारी करने लगे। अब हमारी दुकान पर सामान रिक्शे के बजाय ट्रक से उतरने लगा। दुकान भर गई तो गोदाम किराए पर लिया गया और जब एक गोदाम भर गया तो फिर अपने ख़ाली पड़े एक मकान को भी गोदाम बनाना पड़ा।
हमने अपनी तालीम मुकम्मल करके दूसरा काम शुरू कर दिया और उसके बाद तीसरा और फिर चौथा काम शुरू कर दिया।
दुकान पर हमारे छोटे भाई बैठते रहे और फिर उन्होंने भी अपना एक नया काम शुरू कर दिया। उनके बाद हमारे तीसरे भाई हाफ़िज़ औसाफ़ अहमद ख़ां दुकान को संभालने लगे। फ़िलहाल वही दुकान को संभाल रहे हैं।
कड़ियों की छत और पुरानी फ़िटिंग जा चुकी है। अब नई सीमेंटेड छत है और सामान शीशे के शोकेस वाली शानदार फ़िटिंग में रखा है। मेवे और दाल की बोरियां इतनी हैं कि दुकान में चलने की जगह मुश्किल से बनानी पड़ती है।
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दुकान अब भी मुनाफ़ा दे रही है। हमारे बाद नक़द बिक्री के उसूल को छोड़ दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि हमारा लाखों रूपया लोगों ने दबा लिया। तक़ाज़ा करने का मतलब है, उनसे लड़ाई मोल लेना। ऐसे कई लोगों के पास हमारे वालिद साहब गए और उनकी शक्ल देखते ही लोगों ने रक़म वापस भी कर दी क्योंकि वे हमारे वालिद साहब को और उनके मिज़ाज को अच्छी तरह जानते हैं। हमने अपने वालिद साहब को मना कर दिया है कि आप इन लोगों को मत टोकिए। देने वाला अल्लाह है।
इस दरम्यान कुछ लड़कों ने हमारी दुकान पर नौकरी की। आज उन सबका अपना अपना कारोबार है और वे भी ईमानदारी और सच्चाई से अपनी अपनी दुकानें चला रही हैं। उनकी दुकानें भी सोना उगल रही हैं। इनमें से एक लड़का नौशाद है। जिसने हमारे यहां 300 रूपये माहवार पर नौकरी की और अब उसका अपना अच्छा बिज़नैस है। उसने अपनी कमाई से अपनी बहन की शादी की। अपनी मानसिक रोगी मां का शाहदरा दिल्ली के अस्पताल में कई साल तक इलाज कराया और अल्लाह ने उन्हें पूरी तरह तंदुरूस्त भी कर दिया। उसने अपनी कमाई से अपना मकान बनाया और आज एक ख़ुशहाल ज़िंदगी गुज़ार रहा है।
यह पैटर्न इतना कामयाब है कि हमने इसे जिसे भी बताया वह भी सुखी और समृद्ध हो गया।
ऊदल सिंह, लगभग 50 साल का, 8 बच्चों का बाप है और एक सरकारी चौकीदार है। गुज़र बसर के लिए वह मज़दूरी करता है। क़र्ज़ लेकर उसने अपने 2 लड़कों की बारी बारी से शादी की। शादी के बाद उसके लड़के उससे अलग हो गए और क़र्ज़ उसके सिर रह गया। उसने एक रोज़ हमसे अपनी ग़रीबी और अपने क़र्ज़दार होने की शिकायत की तो हमने उसे कहा कि वह एक मालिक का ध्यान करे और पैग़म्बर मुहम्मद साहब स. के तरीक़े पर व्यापार करे। हमने उससे कहा कि गांव में अपने घर के बाहर लकड़ी का तख्त डालकर तुम उस पर सब्ज़ी की दुकान करो। दो साल में तुम्हारा क़र्ज़ भी उतर जाएगा और तुम अमीर हो जाओगे।
6 माह बाद ही उसने अपनी पिंडलियों पर हाथ रखकर हमें बताया कि ‘गुरू जी ! मैं यहां तक तिर गया हूं।‘
उसकी सेहत भी अच्छी हो गई थी और उसके चेहरे से संतोष भी झलक रहा था।
इतनी तफ़्सील से यह सब बताने का मक़सद यह है कि इसे पढ़ने वालों में आशा का संचार हो।
सन 2020 तक भारत में काम करने लायक़ लोगों का प्रतिशत कुल आबादी का 64 प्रतिशत हो जाएगा। इनकी आयु 15-59 होगी । भारतीय की औसत आयु 29 वर्ष होगी और तब भारत दुनिया का सबसे नौजवान देश होगा। तब चीन, यूरोप और जापान में यह आयु क्रमश: 37, 45 व 48 होगा। ऐसे में हमारे पास एक विशाल ऊर्जा होगी। समाजशास्त्रियों को डर है कि रोज़गार के अवसर देकर इस ऊर्जा का रचनात्मक उपयोग न किया गया तो भारत एक भयंकर गृहयुद्ध में फंस जाएगा। भारत को विनाश से बचाना है तो हरेक हाथ को काम देना होगा और इतने बड़े पैमाने पर तुरंत रोज़गार के मौक़ों को पैदा करना केवल अकेले सरकार के बस की बात नहीं है। इसके लिए हमें अपनी सोच बदलनी होगी। रोज़गार के बेशुमार अवसर हमारे चारों तरफ़ बिखरे हुए हैं। हमें उन अवसरों को पहचानना सीखना होगा।
सपने और महत्वाकांक्षाएं अच्छी बातें हैं लेकिन उन्हें पाने के लिए हमें हक़ीक़त की ज़मीन पर मेहनत करनी पड़ेगी।
नेकी, सच्चाई और ईमानदारी मार्कीट में आपकी साख बनाती हैं और मेहनत आपको सफलता दिलाती है। ईश्वर अल्लाह इसी बात का उपदेश करता है। धर्म यही है.
मानव जाति का कल्याण इसी में निहित है। ऐसा हमने क़ुरआन में भी पढ़ा है और अपने अनुभव से भी हमने यही जाना है।
दुनिया में कोई एक भी नहीं है जो इस महान सत्य को नकार सके।
सुख-शांति, समृद्धि और सफलता का मार्ग यही है।