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Allahpathy:THE BLESSING MONEY BAG THAT WOULD HELP EVERYONE TO BE RICH IN THE MONTH OF RAMADAN

By Hazrat Hakeem Mohammad Tariq Mahmood Chughtai Dear Readers! I Bring to you precious pearls and do not hide anything, you shou...

Monday, July 6, 2015

Allahpathy दुआ की ताक़त The spiritual power

सारी ताक़त का मालिक एक पाक परवरदिगार है जिसे हरेक इलाक़े की हरेक भाषा में बहुत से नामों से जाना जाता है। उसका हरेक नाम पाक है, सुंदर है और शांतिदायक है। जिसने भी जब कभी उससे जो कुछ मांगा है। हमेशा उसने वही चीज़ या उससे बेहतर पाई है। उससे मांगने वाला आज तक कभी नामुराद नहीं हुआ है लेकिन अपने तन-मन और अमल की पवि़त्रता शर्त है। शर्त उस चीज़ को कहा जाता है कि अगर वह चीज़ न पाई तो वह काम ही अपने अंजाम को न पहुंचे जो कि उस पर निर्भर है।

भारत एक अध्यात्म प्रधान देश है। यहां लाखों पीर-फ़क़ीर, साधु-संत और तांत्रिक हुए हैं और आज भी इतने ही हैं। इनमें से कुछ लोग अपने नियम-क़ायदे के प्रति समर्पित हैं और अपने नज़रिये के ऐतबार से समाज के लिए कुछ न कुछ सेवाएं दे रहे हैं। किसी की सेवा आला दर्जे की है और किसी की कमतर दर्जे की है। जो क़ानून के मुजरिम हैं वे इस बहस से बाहर हैं।
ये लोग चाहे ज़िंदा हों या फिर मृत। इनके मठ और दरगाहों पर हर साल करोड़ों लोगों की भीड़ पहुंचती है, अपने मन में एक आशा लेकर कि अगर बाबा का आशीर्वाद हमें मिल गया तो हमारे सारे दलिद्दर दूर हो जाएंगे। 
क़िस्सा मुख्तसर यह है कि वे भी अपनी ताक़त से किसी को कुछ देने की ताक़त रखते बल्कि वे भी किसी और से ही मांगते हैं। कोई इससे मांगता है और कोई उससे लेकिन मांगता ज़रूर है। जिससे वे मांगते हैं उनमें किसी की ताक़त कम है और किसी की ज़्यादा लेकिन एक हस्ती वह है जो इन सबसे बढ़कर ताक़त वाला है। वह हस्ती वह है जिसने इन सबको पैदा किया, जिसने हम सब को पैदा किया, जिसने हर चीज़ को पैदा किया। वह सदा सबकी सहायता के लिए तैयार है। आप अपनी भाषा में ही उसे किसी भी सुंदर से नाम से अपनी मदद के लिए पुकार सकते हैं। आपकी सदा सुनी जाएगी बशर्ते कि आप अपनी दुआ को खुद ही भंग न कर डालें।
इस ब्लाग में मैं आपको मुख्यतः उस मालिक के अरबी नामों और कुरआन की आयतों की दुआ के बारे में जानकारी दूंगा कि इन नूरानी दुआओं की ताक़त से आप कैसे फ़ायदा उठा सकते हैं ?
आम समस्याएं जिनसे आज लोग परेशान हैं, उनमें प्यार मुख्य है। कोई किसी से प्यार करता है लेकिन जिससे वह प्यार करता है वह उसे प्यार नहीं करता। कहीं ऐसा है कि किसी का पति किसी ग़ैर-औरत के फंदे में फंसकर अपनी पत्नी के प्यार को सम्मान नहीं दे रहा है। इसी तरह और भी कई तरह की समस्याएं लोगों की ज़िंदगियों में हैं। 
इसका हल काउंसिलिंग से भी हो सकता है लेकिन इसके लिए दोनों पक्षों को पूरा सहयोग देना पड़ता है लेकिन जहां एक पक्ष तो तैयार हो लेकिन दूसरा पक्ष काउंसिलिंग के लिए तैयार न हो वहां यह मनोवैज्ञानिक तरीक़ा काम नहीं आता। ऐसे में फ़क़त दुआ ही काम आती है। काम बहुत से हैं और मालिक के नाम भी बहुत से हैं। हरेक नाम की तासीर अलग है। अरबी के नामों में ‘अल्लाह‘ को सबसे बड़ा नाम माना गया है। इसके ज़रिये से आप बहुत से काम कर सकते हैं।
इस ब्लाग के ज़रिये कोशिश की जाएगी कि आपको आसान और तेज़ असर दुआओं की जानकारी दी जाए ताकि आपके लिए उन्हें करना आसान हो।
तब तक आप यह दुरूद शरीफ़ याद कर लीजिए क्योंकि आप कोई भी अमल करेंगे उसकी कुबूलियत के लिए आपको दुआ से पहले और दुआ के बाद दुरूद शरीफ़ ज़रूर पढ़ना होगा। 
‘अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिवं-व-अला-आलिहि व-बारिक वसल्लिम‘
यानि ऐ अल्लाह ! आप अपनी ओर से सलात, सलामती और बरकत उतारिए मुहम्मद साहब पर।
यह दुरूद निहायत आसान है और छोटा होने की वजह से इसे याद करना भी आसान है।
आने वाले वक्त में आपको बताया जाएगा कि कैसे आप अपने जायज़ हक़ को, पाक प्यार को पा सकते हैं ?
अगर कोई ताक़तवर दुश्मन अपनी दौलत के नशे में चूर होकर सता रहा है और आप कहीं से कोई क़ानूनी या सामाजिक मदद की उम्मीद भी नहीं रखते तो आप कैसे उसे अपनी दुआ की ताक़त से बर्बाद कर सकते हैं ?
कैसे एक ज़ालिम दौलतमंद दुश्मन को दर-दर का भिखारी बना सकते हैं ?
सुख-शांति, रोज़गार, औलाद, बरकत और हिफ़ाज़त आप जो भी चाहते हैं, हर चीज़ को आप पा सकते हैं अपने यक़ीन की ताक़त से। आपका विश्वास ही आपकी ताक़त है। आपकी दुआ की बुनियाद में भी आपका ही विश्वास काम करता है। 
आदमी मात्र शरीर ही नहीं है बल्कि उसमें एक आत्मा भी है। आप भौतिक जगत में जितनी भी चीज़े घटित होते हुए देखते हैं वे सब उन नियमों के तहत ज़ाहिर होती हैं जो कि आंख से नज़र नहीं आते। उन्हें देखने के लिए अक्ल की आंख की ज़रूरत पड़ती है। दुआ भी दुनिया का दस्तूर है लेकिन यह एक ऐसा नियम है जिसे जानने के लिए अक्ल के साथ-साथ दिल और रूह की भी ज़रूरत पड़ती है। इनमें असंतुलन हो तो आदमी या तो अंधविश्वासी बन कर भटक जाता है या फिर नास्तिक बनकर। दोनों ही तरह के भटकाव घातक हैं। 
विश्वास में मुक्ति है और अंधविश्वास में तबाही।
आपको सजग रहना होगा अपने विश्वास के प्रति अन्यथा विश्वास एक पल में अंधविश्वास में बदल जाता है।
मालिक आपका भला करे।
आमीन !

Allahpathy जिन्न और जादू, दुआ और दवा Quranic Healing

आर्य और सैयद, ईद मिलन पर
ईद के रोज़ सैयद जावेद अहमद एडवोकेट के घर पर जाना हुआ। वह कई साल से अपने घर आने का इसरार कर रहे थे। कचहरी वाली मस्जिद में वह हमारे साथ ही नमाज़ पढ़ते हैं। पिछले साल ईद पर पहली बार उनके घर जाना हुआ या उसके बाद इस ईद पर। इस बार हम मय अहलो-अयाल (विद फ़ैमिली) गए थे। हम ड्राइंग रूम में बैठ गए और हमारी अहलिया बच्चों के साथ अन्दर ज़नानख़ाने में चली गईं। हमारे पास जावेद भाई के एक रिश्तेदार सैयद आरिफ़ साहब भी आ गए। वह एक दवा कम्पनी में एम. आर. हैं। आरिफ़ भाई सिद्दीक़ भाई के दामाद भी हैं। सिद्दीक़ भाई की बड़ी बेटी उनके निकाह में है। अल्हम्दुलिल्लाह, डा. रानी अफ़ज़ल के नर्सिंग होम में 15 अगस्त 2013 को उन्हें दूसरे सिजेरियन ऑप्रेशन से दूसरा बेटा नसीब हुआ है। सिद्दीक़ भाई हमारी कॉलोनी के इलेक्ट्रिीसिटी सुपरवाइज़र हैं।
हमारी बातचीत का मौज़ू क़ुरआन और सीरत था। जावेद भाई ने अपने बच्चों से कहा कि ‘बेटा ये हमारे अनवर भाई हैं। इन्हें दीन की बहुत जानकारी है। अब आप जो सवाल करना चाहो, इनसे कर लो।‘
शीर खाते हुए हमने कहा कि ‘भाई, सब तो हम नहीं जानते। आप सवाल पूछिए, हमें पता होगा तो ज़रूर बताएंगे।‘
जावेद भाई के बच्चों के अलावा और भी कई लोग वहां दिलचस्पी से बात सुन रहे थे। इसी दौरान सिद्दीक़ भाई के दामाद आरिफ़ साहब ने कहा कि ‘हमारी ससुराल के लोग नमाज़ नहीं पढ़ते। आप उन्हें नमाज़ पढ़ने के लिए क्यों नहीं कहते ?‘
हमने कहा कि ‘वे मुसलमान हैं, सैयद हैं। उन्हें ख़ुद पता है कि उन्हें नमाज़ पढ़नी चाहिए। फिर भी वे नहीं पढ़ते हैं तो ऐसा वे जानबूझ कर करते हैं। ऐसे में अगर हम उन्हें सीधे नमाज़ पढ़ने की नसीहत करेंगे तो वे उस नसीहत को भी नज़रअन्दाज़ कर देंगे और अगर हम उसके बाद भी उन्हें नमाज़ के लिए टोकते रहे तो वे चिढ़ने लगेंगे। हमारा दीन हमें हिकमत की तालीम भी देता है। हर बात को कहने का एक मुनासिब मौक़ा है। जबकि वह सबसे ज़्यादा असर करती है और यह तब होता है जबकि सुनने वाला क़ुबूल करने की नीयत से सुने।‘

भयानक सपना
इस बात को हुए 2 हफ़्ते भी नहीं गुज़रे थे कि सिद्दीक़ भाई का बड़ा बेटा फ़रहान हमारे घर आया। उसने कहा कि आपको पापा बुला रहे हैं। हम उनके घर पहुंचे तो सिद्दीक़ साहब ने बताया कि रात में 1 बजे के क़रीब उनके बेटे फ़रहान और उनकी बेटी सुम्बुल ने एक ही ख़्वाब एक साथ देखा और उसके बाद सुम्बुल की आंख खुल गई और वह बुरी तरह डरी हुई थी।
फ़रहान ने बताया कि मैंने देखा कि एक डरावनी शक्ल की एक औरत मुझसे मेरे बाल मांग रही है। मैंने कहा कि तू ख़ुद ले ले। उसने कहा कि मैं तुझे छू नहीं सकती। मैं लेटा हुआ था। उसने मुझ पर अपना पैर रखना चाहा तो उसके पैर में आग सी लग गई और उसने चीख़ मारकर अपना पैर हटा लिया और उसने मेरी बहन सुम्बुल के बाल पकड़ लिए।
इसके बाद सुम्बुल ने बताया कि एक डरावनी शक्ल की औरत ने मेरे बाल पकड़ लिए और वह कहने लगी तू मुझे अपने बाल दे दे। मैं मना करने लगी तो वह मेरे बाल पकड़ कर मुझे घसीटने लगी। तभी डरकर मेरी आंख खुल गई। फ़रहान और घर के दूसरे लोग भी जाग गए। बाक़ी रात जागते हुए ही कटी।

सपने भी बेकार नहीं होते
यह एक अजीब बात थी कि रात को सोते हुए दो अलग अलग लोगों ने बिल्कुल एक ही ख़्वाब देखा था। इसे हम हदीसुन्-नफ़्स (मन की कल्पना) की श्रेणी में नहीं रख सकते थे। एक ऐसा ख़्वाब था, जो अपने अंदर एक हक़ीक़त रखता है। ये सारी अलामात ‘जिन्नाती सहर‘ की हैं। सद्दीक़ साहब को उम्मीद थी कि हम इस मसले को ज़रूर हल कर देंगे। वह बड़ी उम्मीद से हमारा मुंह तक रहे थे कि हम क्या कहते हैं ?

हाज़िरातः एक रूहानी अमल
हमने कुछ कहने से पहले क्रॉस चेक कर लेना मुनासिब समझा। इसके लिए हमने हाज़िरात का एक आसान अमल किया। जिसे हमारे पाठक भी आसानी से कर सकते हैं। यह अमल बेशक आसान है। इसके लिए किसी साधना की या नियमों के किसी कठोर बंधन की ज़रूरत नहीं है। बस आदमी का दिल पाक और नीयत ख़ालिस और वह हाज़िरात के अमल का तरीक़ा जानता हो कि कैसे हाज़िरात के मौअक्कलों से अदब से बात करनी और कैसे शैतान जिन्नों को पकड़ना है और उन्हें कहां क़ैद करना है ?
आमिल के कहने से हाज़िरात के मौअक्कल जिन्नात को जला भी देते हैं लेकिन हम उन्हें जलाने के लिए कभी नहीं कहते। हाज़िरात के अमल का तरीक़ा पूरी तफ़्सील के साथ उर्दू किताबों में मौजूद है। हाज़िरात का अमल संजीदा लोगों के बीच किया जाए। जहां सब लोग इसलामी तरीक़े से बदन को ठीक तरह ढक कर बैठे हों। लड़की हो या लड़का, इलाज के वक़्त उसके घर वालों को मौजूद रखा जाए। लड़की को छूने से परहेज़ किया जाए। दुआ वग़ैरह पढ़कर दम करना हो तो बिना उसे छुए दूर से किया जाए। 

हिफ़ाज़त के लिए हिसार बनाने का तरीक़ा
सुम्बुल डबल बेड पर बैठी हुई थी। हम उसके सामने दूसरे किनारे पर बैठ गए। हाज़िरात शुरू करने से पहले, हमने सुम्बुल से अपना सिर ढकने के लिए कहा और उसकी बग़ल वाली जगह कुर्सी बिछाकर सिद्दीक़ भाई को बैठा दिया ताकि जिन्नाती अटैक के बाद वह लुढ़क कर ज़मीन पर न जा गिरे। उसकी मां और भाई फ़रहान भी दायरा बना कर कुर्सियों पर बैठ गए। पहले हमने ‘आउज़ू-बिल्लाहि मिनश्-शैतानिर्-रजीम‘ कहा और फिर ‘बिस्मिल्लाहिर्-रहमानिर्-रहीम‘ पढ़ी। फिर हमने क़ुरआन की कुछ सूरतें पढ़कर अपने ऊपर और सब लोगों पर हिसार बराय हिफ़ाज़त की नीयत से दम (फूंक) किया। इसके लिए दुरूद शरीफ़, सूरा ए फ़ातिहा, आयतल-कुर्सी, चार क़ुल, लाहौल काफ़ी हैं। बाज़ार में मिलने वाली नमाज़ की किताब में ये सब मिल जाती हैं। इन्टरनेट से भी इनका प्रिन्ट आउट लिया जा सकता है।
हमने इनके साथ अल्लाह के पाक नाम ‘या हफ़ीज़ु या सलाम‘ और आयत ‘सलामुन क़ौलम्-मिर्रबिर्रहीम‘ को भी पढ़ा। हिसार के और भी कई तरीक़े हैं, जो कि किताबों में मिलते हैं। 

हिसार के फ़ायदे
हिसार एक मज़बूत क़िले में पनाह लेने जैसा है।
हिसार करके घर से निकलें तो दुश्मनों के हमलों से और हादसों से भी महफ़ूज़ रहेंगे और डाह रखने वालों की नज़र भी बेअसर रहेगी। 
रात को सोते वक़्त अपने घर और अपनी दुकान का हिसार करेंगे तो आपका माल चोरों से महफ़ूज़ रहेगा। 
इन सूरतों और दुआओं को पढ़कर ख़याल से अपने घर और मकान के चारों तरफ़ उंगली से सात बार दायरा बना दें और फूंक दें। 
हमारी दादी साहिबा यह अमल करके सिर पर दोनों हाथ ले जाकर ज़ोर की ताली भी बजाती हैं। कहती हैं कि जहां तक यह आवाज़ जाएगी, वहां तक हिफ़ाज़त रहेगी। आज उनकी उम्र 95 साल से ज़्यादा है। अल-हम्दुलिल्लाह कभी चोरी नहीं हुई जबकि घर की छत आस पास के मकानों की छतों से मिली हुई है और घर के आंगन पर लोहे का कोई जाल भी नहीं है। आंगन बहुत बड़ा था। सो इतने बड़े आंगन पर जाल लगवाना मुमकिन भी नहीं था और ज़रूरत भी नहीं थी। हिसार का अमल जो था। 
स्कूल जाते हुए बच्चों पर हिसार की दुआएं फूंक दी जाएं तो वे हादसों और अपहरण से महफ़ूज़ रहेंगे। 
आजकल लड़कियां दिल्ली और मुम्बई जैसे शहरों में बलात्कारियों का शिकार हो रही हैं। वे भी हिसार का लाभ उठा सकती हैं।
हम सुबह और शाम की नमाज़ के बाद पाबन्दी से हिसार करते हैं। बरसों से हमारा यही अमल है। 

हाज़िरात का तरीक़ा
बहरहाल हमने सुम्बुल को आंख बंद करने के लिए कहा और उसे हिदायत की कि जब तक हम न कहें, वह आंख न खोले और जो भी देखे या महसूस करे उसे बोलकर बता दे। इसके बाद हमने अल्लाह से मदद की दुआ की और हाज़िरात की नीयत से ‘या रहमानु‘ पढ़ना शुरू कर दिया। बीच बीच में हम इस पाक नाम के मौअक्कल के हाज़िर होने के लिए कहते रहे। चंद लम्हों बाद ही सुम्बुल पर हाज़िरात हो गई। इस पाक नाम के मौअक्कल ने डरावनी शक्ल की उस औरत को भी पकड़कर हाज़िर कर दिया, जिसने सुम्बुल के बाल पकड़कर खींचे थे। उसकी डरावनी शक्ल देखकर सुम्बुल बुरी तरह डर रही थी। हमने उस औरत से उसका नाम और उसका मक़सद पूछा तो वह निडर हो कर हंसने लगी और उसने कुछ भी नहीं बताया।
आम तौर पर सरकश जिन्नात का बर्ताव यही होता है। ऐसे मौक़ों पर क़ुरआन की वे आयतें पढ़ी जाती हैं जहां अल्लाह ने अपने ज़ालिम और सरकश बंदों को दर्दनाक सज़ा की ख़बर दी है। इन आयतों की तिलावत के बाद वहां उन आयतों से ताल्लुक़ रखने वाले फ़रिश्ते एक्टिव हो जाते हैं और एक ज़बर्दस्त पाज़िटिव ऊर्जा क्रिएट होती है। जिससे नकारात्मक ऊर्जा वाले सरकश जिन्न भयानक कष्ट अनुभव करते हैं और वे रोने और गिड़गिड़ाने लगते हैं। इस बार भी यही हआ। जैसे ही हमने चंद बार ‘सनुद-उज़्ज़बानिया‘ (क़ुरआन 96, 18) कहा तो सुम्बुल रोने लगी और वह दाईं तरफ़ बेड पर गिरकर तड़पने लगी जैसे कि उसे भयानक कष्ट हो रहा हो। यह उस लेडी जिन्न को होने वाले अहसास का रिफ़्लेक्शन था। 
इसके बाद हमने ‘या रहमानु या रहमानु‘ पढ़कर उसे गिरफ़्तार कर लेने का हुक्म दिया और सुम्बुल के और पूरे परिवार के ऊपर से जिन्न और जादू के असर के असर को ख़त्म करने का हुक्म दिया। जिसकी तामील मौअक्कलों द्वारा की गई। हाज़िरात को ख़तम करने के तयशुदा तरीक़े से हमने हाज़िरात ख़तम कर दी। सुम्बुल उठी तो उसका दिल दिमाग़ फूल की तरह हल्का था। उससे पूछा कि तुम गिर कर क्यों रो रही थीं ?, तो उसे कुछ याद न था।

बीमारी के पीछे शैतान
हमने बरसों पहले इसी कॉलोनी में वेदपाल की जवान बेटी पर हाज़िरात की थी तो उसकी भी यही हालत हुई थी। वह बेड पर पीछे की तरफ़ लुढ़क कर अपने पेट को दोनों हाथों से मसलने लगी थी। उसे जवान हुए कई साल बीत गए थे लेकिन उसे मासिक धर्म नहीं हुआ था। डाक्टर ने उसका काफ़ी इलाज किया गया था। एम्स में उसका ऑप्रेशन तक कर दिया गया था लेकिन उसकी परेशानी दूर नहीं हुई थी। वे निराश हो चुके थे। मुज्तबा भाई के कहने पर हम उनके घर गए। हमने उसे सिर्फ़ एक बार इसी तरीक़े से दम किया था और अल्लाह से उसका कष्ट दूर होने के लिए दुआ की थी। उसके कुछ दिन बाद ही उसे मासिक धर्म होना शुरू हो गया था। वेदपाल ने जबरन मिन्नत करके चाय समोसा खिला दिया था। सिद्दीक़ भाई के घर पर हमने सिर्फ़ पानी ही पिया।

मिज़ाज न मिले तो शैतान टिक नहीं पाते
अमल के बाद हमने कहा कि ये नाफ़रमान जिन्नात उन्हीं लोगों को सताते हैं जो कि नाफ़रमान होते हैं। आप सब लोग नमाज़ की पाबंदी करें और क़ुरआन की आयतें पढ़कर अपने ऊपर और सुम्बुल के ऊपर दम किया करें। सुम्बुल की अम्मी अल-हम्दुलिल्लाह पहले से ही नमाज़ की पाबंद हैं। हमने फ़रहान से पूछा कि आप नमाज़ पढ़ते हो ?
उसकी तरफ़ से जवाब नहीं में मिला।
हमने कहा कि आप लोग सैयद हैं। आपके घर से दीन चला। दुनिया ने आपसे नमाज़ सीखी और ख़ुद आपने नमाज़ छोड़ दी। आपको तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से नस्ल के ऐतबार से भी निस्बत है। आपको तो औरों से बढ़कर दीनदार होना चाहिए। हम पठान हैं। मुसलमान होने से पहले हम बुद्धिस्ट थे। हम पाँच वक़्त की नमाज़ पढ़ रहे हैं और आप नमाज़ नहीं पढ़ते ?

सैयद सुस्त, आर्य चुस्त
अजीब मन्ज़र था। एक आर्य सेमेटिक नस्ल वाले को नमाज़ अदा न करने पर शर्म दिला रहा था और सेमेटिक नस्ल वाला वह आदमी भी कोई और नहीं, पैग़म्बर मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का एक वंशज था।
आज इसलाम का झंडा आर्यों के हाथ में है। कहीं किसी सैयद के हाथ में होगा तो वहां भी आर्य साथ में खड़े हुए मिलेंगे।

रूहानी मदद के लिए रूहानी उसूलों की पाबन्दी ज़रूरी है
अगले दिन सुम्बुल पर फिर अटैक हुआ। उसने फ़रहान को गंदी गाली भी दी थी जो कि उसकी आदत नहीं थी। उसके हाथ लयबद्ध तरीक़े से हिल रहे थे। इस बार उसे अपने पास बेड पर ही वह औरत बैठी हुई नज़र आ रही थी। फ़रहान हमें बुलाने के लिए आया तो उसके घर की तरफ़ जाते हुए हम सोचने लगे कि ऐसा क्यों हुआ ? 
हम उनके घर में घुसे तो देखा कि सिद्दीक़ भाई बनियान के नीचे पट्टू का कच्छा पहने हुए कुर्सी पर बैठे हैं और बीड़ी पी रहे हैं। पीछे दीवार पर एक छोटी सी तस्वीर भी टंगी है। हमें देखकर सद्दीक़ भाई को अहसास हुआ कि उन्हें कच्छे में नहीं होना चाहिए था।

अपने कष्ट का कारण हम ख़ुद ही हैं
हमने उनसे कहा कि देखिए हमारी ग़लतियों की वजह से हम पर तकलीफ़ें आती हैं, चाहे तकलीफ़ की कोई क़िस्म हो। मुसीबत में पड़कर हम उस पैदा करने वाले रब को पुकारते हैं। उसकी रहमत हम पर बरसती है। वह मदद के लिए अपने फ़रिश्ते भेजता है लेकिन हम अपने अमल से रहमत के फ़रिश्तों को सपोर्ट नहीं करते। जहां नंगापन, नापाकी, बदबू और झूठ हो, उस जगह रहमत के फ़रिश्ते जाते ही नहीं हैं। गंदा माहौल उनके पाक मिज़ाज को सूट नहीं करता। लिहाज़ा आप घर में तहमद या पाजामा पहना करें। बीड़ी कहीं दूर जाकर पिएं। दीवार से तस्वीर उतार दें और कमरे में अगरबत्ती से ख़ुश्बू करें।
हमारे पहुंचते ही वह औरत नज़र आना बंद हो गई। सुम्बुल नॉर्मल हो गई। सुम्बुल मेन्टली उस लेडी जिन्न की ट्राँस में थी। जादू इंसान के माइंड पर अटैक करता है। अगर विल पॉवर बहुत मज़बूत हो तो जादू कम ही असर करता है और कर भी दे तो उसका असर जल्दी ही ख़तम हो जाता है। दुआओं के ज़रिए इंसान की क़ूव्वते इरादी यानि इच्छा शक्ति भी मज़बूत होती है। दुआ इसी उम्मीद के साथ की जाती है कि क़ादिरे मुत्लक़ अल्लाह उसकी मदद करेगा। 

दुआ भी एक दवा है
हमारा रोज़ का तजुर्बा है कि कड़वे बोल गहरे घाव कर जाते हैं जबकि मीठे बोल मरहम का काम करते हैं। दुआ भी एक दवा है और दवा भी ज़बाने हाल से की जाने वाली एक दुआ है। आप दुआ को देखिए। आप उसमें मीठे और उम्दा बोल भरे हुए पाएंगे। दवा को भी उसी रब ने पैदा ने किया है। जिसमें उसके इल्म और उसकी क़ुदरत का निशान ज़ाहिर हुआ है। इन दवाओं के ज़रिए भी नर्वस सिस्टम को ताक़तवर बनाया जा सकता है। आपको सुनकर शायद ताज्जुब हो कि कई बार ऐसा भी होता है कि दवा दी जाती है तो जिन्न भाग जाता है। दरअसल होता यह है कि नर्वस सिस्टम ताक़तवर होते ही इंसान का माइंड जिन्नात की गिरफ़्त से आज़ाद हो जाता है।

दवाओं से भी जिन्न और जादू का इलाज मुमकिन है
यह एक पेचीदा और लम्बा सब्जेक्ट है। यहां सिर्फ़ यह बताना मतलूब है कि ऐसे मरीज़ों को मुनासिब दवा दी जाए तो उससे भी उनकी तकलीफ़ दूर हो जाती है। आम तौर पर एलोपैथी में ऐसे मरीज़ों को नींद की दवा दी जाती है। दिमाग़ को राहत मिलने से उसमें ताक़त और ताज़गी आ जाती है और वह अदृश्य सूक्ष्म शरीरी शक्तियों की ट्राँस से आज़ाद हो जाता है।
जब मन बीमार और कमज़ोर हो जाता है। तभी सोते-जागते हुए भुतहा अनुभव होते हैं। मानसिक शक्ति को खाने पीने की चीज़ों के ज़रिये भी बढ़ाया जा सकता है। एक हदीस में आता है कि

‘मैंने सा‘द (रज़ि) से सुना है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया करते थे कि जिसने सुबह उठते ही सात अज्वह खजूरें खा लीं। उस दिन उसे जादू और ज़हर भी नुक्सान न दे सकेंगे।‘
(बुख़ारी, मुस्लिम, अबू-दाऊद) 

कई और चीज़ें भी मन की कमज़ोरी को दूर करती हैं। आयुर्वेद में ऐसे मामलों में अपतन्त्रकारी बटी (हिस्टीरियाहर बटी), ब्राह्मी बटी (बुद्धिवर्धक), माँस्यादि क्वाथ और सारस्वतारिष्ट जैसी असरकारी दवाएं हैं। यूनानी पैथी में इसे ‘सौदावी मर्ज़‘ मानकर दवा दी जाती है। इस मर्ज़ को ‘काबूस‘ कहा जाता है। जिसमें मरीज़ जिन्न-परी देखता है और उनकी आवाज़ें सुनता है। मरीज़ के सिर में रोग़ने कददू की मालिश करने के साथ उसे कुछ माजून वग़ैरह दी जाती हैं। ये ज़ायक़े के ऐतबार से आयुर्वेदिक दवाओं से बेहतर होती हैं लेकिन जो मीठी दवाएं भी मन मारकर खाते हैं, उनके लिए होम्योपैथिक दवाएं बढ़िया हैं। इन्हें लाना, ले जाना और खाना सब कुछ आसान है। इनकी डोज़ भी कम है।

अल्लाह अपनी रहमत नाज़िल करे होम्योपैथी के खोजी डा. सी. एस. हैनीमैन रहमतुल्लाह अलैह पर, जो कि मुसलमान हो गए थे। उन्होंने वाक़ई हमें एक आसान तरीक़ा ए इलाज हमें है, जो किफ़ायती भी है। अरबपति सेठ से लेकर बीपीएल कार्ड धारक तक होम्योपैथी से इलाज करा सकता है और अगर उसमें थोड़ी समझ-बूझ भी है तो अपना इलाज वह ख़ुद ही कर सकता है। होम्योपैथी में बीमारी का कोई नाम नहीं है। यही वजह है कि इस पैथी में कैंसर, एड्स और पोलियो जैसी बीमारियों का इलाज भी मौजूद है। जिनका इलाज अभी एलोपैथ दरयाफ़्त ही कर रहे हैं। हमारे मोहतरम डा. सैफ़ुल्लाह अंसारी साहब के क्लिनिक से इन अमराज़ के अनगिनत पेशेन्ट ठीक हो चुके हैं। उन्हीं की वजह से हमें इस पैथी पर यक़ीन आया वर्ना हम यही समझते थे कि देखो समझदार हो कर भी लोग ऐसी गोलियां खा रहे हैं, जिनका लैब टेस्ट किया जाए तो उनमें दवा का नामो-निशान तक न निकले।
लैब टेस्ट में भले ही दवा साबित न हो लेकिन वह अपने सूक्ष्म रूप में मौजूद होती है और वह तेज़ी से असर भी करती है। जिन्न भी कहां दिखाई देते हैं लेकिन होते हैं और अपना असर डालते रहते हैं।

बारिश का पानी एक बहुत बड़ी दवा है
गंदी गाली के लक्षण पर हमने उसे हायोसायमस 30 देने के लिए अपनी किट देखी तो उसमें शीशी ख़ाली मिली। हमने उसमें आसमान से उतरा हुआ बारिश का पानी डाल दिया। हमने सुम्बुल को एक डोज़ दिलवाई और फिर उस एक ड्राम के कन्टेनर में फ़रहान से सादा पानी भरवा दिया कि इसे सुबह को पिला देना।
क़ुरआन (25, 48) में बारिश के पानी को ‘माअन तहूरा‘ यानि पवित्र करने वाला जल  और बरकत वाला पानी (क़ुरआन 50, 9) कहा गया है। नापाकी को दूर करने के लिए पाक चीज़ ही काम में लाई जाती है। आसमान से उतरा हुआ पानी, आम पानी के मुक़ाबले इंसान के बदन को सेल्युलर लेवल पर ज़्यादा अच्छे तरीक़े से पाक करता है क्योंकि इसमें नेचुरली हाइड्रोजन पर-ऑक्साइड (H2O2) होता है। जिसमें ऑक्सीजन का एक मॉलेक्यूल ज़्यादा होता है। इसके पीने से बदन में ऑक्सीजन का लेवल बढ़ जाता है। इससे शरीर की कोशिकाएं ज़्यादा ऑक्सीजन लेती हैं और वे ज़्यादा अच्छे तरीक़े से गंदगी को बाहर निकाल पाती हैं। गंदगी जिस्म से बाहर निकल जाए तो बीमारी की असल वजह बाहर निकल जाती है। 
पानी कम पीने की वजह से लोगों के जिस्म में बरसों पुरानी गंदगी पड़ी सड़ रही है। लोग इसी वजह से बीमार हैं। अगर लोग अपने बदन को अन्दरूनी तौर पर पाक कर पाएं तो उनकी ऐसी बीमारियां भी दूर हो जाएंगी, जिन्हें लाइलाज माना जाता है। इस उसूल को काम में लाया गया तो नेचुरोपैथी वुजूद में आ गई।
पानी बीमारी के असल सबब गंदगी और टॉक्सिन्स को ही दूर कर देता है। इसी के साथ वह इम्यून सिस्टम को भी बूस्ट अप करता है। इम्यून सिस्टम मज़बूत हो तो हरेक बीमारी के कीटाणुओं को वह ख़ुद ही ख़त्म देता है। दुनिया में एक इम्यूनोपैथी भी है। जो कि इसी उसूल पर काम करती है।

पुरानी डायरीः एक रूहानी सरमाया
उनके इसरार पर हमने उन्हें अल्लाह के नाम लिखकर दो तावीज़ भी दिए। यह दोनों तावीज़ हमने उस डायरी से नक़ल किए थे जो हमें मौलवी सिराज साहब ने अपने हाथ से लिखकर दी थी, बरसों पहले। उसमें उन्होंने वे तावीज़ और अमल लिख कर दिए थे। जो कि करने में आसान हैं और असर तेज़ करते हैं। मौलवी सिराज साहब आज एक मशहूर बंगाली आमिल हैं। उनकी कोठी पर दूर दूर से आए मरीज़ों की भारी भीड़ लगी रहती है। हम जिन दिनों सहारनपुर के मशहूर रूहानी आमिल हाफ़िज़ जमील अहमद जमील सिकन्दरपुरी साहब रह. के पास अमलियात सीखने के लिए जाया करते थे तो वहीं पर हमारी उनसे मुलाक़ात हुई थी। उस समय वह उनके चीफ़ असिस्टेन्ट हुआ करते थे।

निगाहे मर्दे मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरें
बहरहाल दुआ और दवा के बाद सुम्बुल की हालत में काफ़ी सुधार हुआ। बस अब कभी कभार उसका शरीर बेअख्तियार हिलने लगता था। कभी कभी वह डर जाती थी। उसे अपने जिस्म में सुई चुभने जैसा अहसास भी होता था। अब हमें होम्योपैथिक मेडिसिन्स ‘इग्नेशिया‘ और ‘एपिस मेलिफ़िका‘ में से किसी एक का चुनाव करना था। हमने डा. फख़रे आलम हाशमी, मुरादाबाद से मोबाईल पर सलाह मांगी। डा. फ़ख़रे आलम एक ज़बर्दस्त होम्योपैथ हैं और सैयद भी। जिस बीमारी का इलाज कहीं न हो, उसका इलाज इन्शा अल्लाह उनके पास मिलेगा। जब वह अलीगढ़ से इलेक्ट्रोनिक्स एंड टेली कम्यूनिकेशन इन्जीनियरिंग कर रहे थे। तब वह डा. अहसानुल्लाह ख़ाँ, धौर्रा से मिले। जो होम्योपैथी में एक बड़ा नाम हैं और केमिकल इन्जीनियरिंग में एम. टेक हैं। सैयद साहब ख़ान साहब की सोहबत में आए तो उनका रूझान होम्योपैथी की तरफ़ हो गया। डा. फ़ख़रे आलम अलीगढ़ से डिग्री इन्जीनियरिंग की लेकर लौटे लेकिन आज वह प्रैक्टिस होम्योपैथी की कर रहे हैं। बनने क्या गए थे और क्या बनकर लौटे !
उनकी उम्र अभी 30 साल भी नहीं है। उन्होंने सुम्बुल को इग्नेशिया 30 की 3 डोज़ 10-10 मिनट के फ़र्क़ से देने के लिए कहा। हमने ऐसा ही किया। 
फ़रहान ने पूछा कि अब यह दवा कब देनी है ? 
हमने कहा कि अब नहीं देनी है। बस यही काफ़ी है।

हाव भाव से जानिए मन का हाल
एक दिन बाद हम अपने बेटे के साथ पार्क की तरफ़ से आ रहे थे। हमने फ़रहान को मन्दिर के सामने वाले खड़न्जे पर जाते हुए देखा। हमने एक उचटती हुई नज़र डालने के बाद नज़रें झुका कर अपने बेटे से कहा कि बेटा देख रहे हो, फ़रहान की चाल में कैसी बेपरवाही है। वह हमारी तरफ़ ख़ास मुतवज्जह नहीं हुआ है।
बेटे ने कहा कि जी हां, देख रहा हूं।
हमने कहा कि इसका मतलब यह है कि इसे हमारी ज़रूरत नहीं है यानि इसकी बहन की तबियत ठीक है।
हम अपने बेटे को लोगों के हाव-भाव से उनके मन में चल रही हलचल को पढ़ना सिखाते रहते हैं। पहले इसे क़ियाफ़ा-शनासी कहा जाता था। आजकल इस आर्ट का नाम मेन्टलिज़्म है। कुछ लोग इसे बॉडी लेंग्वेज भी कहते हैं।
फ़रहान उत्तर से दक्षिण की तरफ़ जा रहा था जबकि हम पूरब से पश्चिम की तरफ़। एक जगह आकर हम दोनों पास पास आ गए। उसने सलाम किया। हम कुछ लम्हे इन्तेज़ार करते रहे कि वह सुम्बुल की ख़ैरियत के बारे में ख़ुद बताए। उसने नहीं बताया। तब हमने ही उसकी ख़ैरियत दरयाफ़्त की। 
घर आकर हमारे बेटे ने हमें बताया कि मैं तो आपके बताने से पहले ही समझ गया कि फ़रहान की बहन की तबियत ठीक है।
हमने कहा कि आपने कैसे जाना बेटे ?
उन्होंने कहा कि चलने से पहले वह ज़हूर धोबी के बच्चों के साथ हंसी ठिठोली कर रहे थे। आदमी घर से बाहर हंसी-मज़ाक़ तभी कर पाता है जबकि वह अपने घर की तरफ़ मुतमइन हो।
बेटे का तर्क सुनकर हमने जान लिया कि माशा अल्लाह वह अच्छी रफ़्तार से तरक्क़ी कर रहे हैं।

आसान टोटके समस्या का समाधान नहीं होते
आज 31 अगस्त 2013 को सिद्दीक़ भाई एक जगह अचानक मिल गए। उन्होंने मुस्कुरा कर कहा कि सुम्बुल अभी भी कभी कभार डर जाती है, उस पर असर अभी भी है।
हमने कहा कि आप नमाज़ शुरू कर दीजिए, असर चला जाएगा। जो काम हमारा था। वह हमने कर दिया है। जो आपके ज़िम्मे है, उसे आपको ही करना होगा। आप अपना काम नहीं करेंगे तो इलाज कराते हुए आपकी उम्र गुज़र जाएगी लेकिन असर नहीं जाएगा। वह नित नई बीमारियों और मुसीबतों का रूप धर कर आता रहेगा और आपके परिवार को सताता रहेगा।
उन्होंने कहा कि कुछ कील वग़ैरह पढ़ कर दे देते।
हमने दिल में कुढ़ते हुए उनके ख़याल की दाद दी। वाह रे सहूलतपसन्दी! मुसीबत सिर पर पड़ी हुई है और सैयद साहब फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ने के लिए हामी नहीं भर रहे हैं। हमने कहा कि इस मामले में कोई कील-वील का अमल नहीं चलेगा। फ़क़त नमाज़, क़ुरआन और दुआ का अमल चलेगा।

कम हैं जो उस रब की बन्दगी का हक़ अदा करते हैं
सिद्दीक़ साहब अभी भी पहले की तरह नमाज़ से दूर हैं लेकिन हमने एक दिन फ़रहान को मस्जिद में नमाज़ पढ़ते हुए देखा। नसीहत ठीक मौक़े पर की गई थी, लिहाज़ा वह रंग लाई। ज़्यादातर लोगों के लिए यह बात कोई अहमियत नहीं रखती कि अल्लाह ने हमें क्यों पैदा किया है और वह हमसे क्या चाहता है ?
यह फ़िक्र दिल में न हो तो आदमी मस्जिद से भी बिना हिदायत पाए ही लौटता है। यही वजह है कि नमाज़ पढ़ने वाले भी नाफ़रमानियां करते रहते हैं। जब वे नमाज़ पढ़ रहे होते हैं, तब भी उन्हें ख़ुदा की चाहत के बजाय अपनी चाहत से ही वास्ता होता है। उनका काम अटक गया तो वे ख़ुदा को पुकारने लगे। जब उनकी मुसीबत टल जाएगी तो वे फिर पहले जैसे हो जाएंगे। जब इंसान का शऊर जागता है तभी यह कैफ़ियत बदलती है। मौत की याद और ख़ुदा के सामने हाज़िरी का अहसास इंसान में यही शऊर जगाते हैं। नमाज़ और हज के ज़रिये इसी याद और अहसास को बार बार ताज़ा किया जाता है। 
हम क्या चाहते हैं ?, इसकी कोई वैल्यू नहीं है। हमारा पैदा करने वाला हमसे क्या चाहता है ?, असल अहमियत इसकी है। यह दुनिया उस रब की है। लिहाज़ा यहां उसी की योजना लागू है और उसी की मंशा पूरी हो रही है। हमारी चाहत उसकी मंशा के मुताबिक़ है तो हम सही हैं और अगर हमारी चाहत उसकी मंशा के खि़लाफ़ तो हम अपनी चाहतें पूरी करने में बर्बाद हो जाएंगे। 

‘रब‘ के बिना ‘सब‘ बेकार है
दुनिया यही ग़लती करके बर्बाद हो रही है। कोई मर रहा है और कोई मार रहा है। जो ज़िन्दा हैं, उनकी अक्सरियत म्यूज़िक, नशे और एडवेन्चर के ज़रिये आनंद-प्राप्ति के जज़्बे को पूरा करने की कोशिश करती है लेकिन फिर उनके भी अन्दर शून्य बदस्तूर बाक़ी रहता है। जो उन्हें बताता रहता है कि हक़ीक़त में जो चीज़ मतलूब (वांछित) है, वह अभी तक हासिल नहीं हुई है। वह मतलूब चीज़ हक़ीक़त में कोई चीज़ नहीं है बल्कि सारी चीज़ों का ख़ालिक़ (क्रिएटर) और मालिक ख़ुद है। वह एक है। जब तक ‘एक‘ न मिले तब तक शून्य तो बना ही रहता है। इसे मैथ के ज़रिए भी समझा जा सकता है। ‘एक‘ आ जाता है तो शून्य बच नहीं पाता। वह बच ही नहीं सकता।
रहमत वाला वो रब हमसे क्या चाहता है ?
क़ुरआन में उसने यही बताया है लेकिन उसे पढ़ने वाले भी कम हैं और उसे समझ़ने वाले उससे भी कम हैं। क़ुरआन पर अमल करने वाले बहुत ही कम हैं।

सुधार से ही होगा उद्धार
लोग मुसीबतों से परेशान हैं। वे रब की रहमत को पुकार रहे हैं लेकिन ख़ुद को बदलने के लिए तैयार नहीं है। इसी बात का फ़ायदा ढोंगी बाबा उठाते हैं। वे किसी को सकारात्मक सोच अपनाने और अपना फ़र्ज़ अदा करने के लिए नहीं कहते। वे तक़दीर बदलने के लिए आसान टोटके बताते हैं क्योंकि पब्लिक ऐसा ही चाहती है। ऐसे में वे किसी का माल और किसी की आबरू लूट लेते हैं। ये सरकश इंसान हैं। शैतान सिर्फ़ जिन्नों में ही नहीं होते बल्कि इंसानों में भी होते हैं। शैतान जिन्नों से बचना आसान है लेकिन शैतान इंसानों बचना बहुत मुश्किल है। आम बुद्धि के लोग इन्हें अपना गुरू बनाए बैठे हैं।
हरेक की पहचान उसके अमल से होती है। इंसान को उसके अमल के आईने देखो तो इंसान और शैतान का फ़र्क़ साफ़ नज़र आएगा।

धर्म का पालन करते हुए भी पाखंडी धंधेबाज़ों का उन्मूलन संभव है
सुम्बुल के साथ पेश आने वाले वाक़ये को काफ़ी तफ़्सील से लिखा गया है। इसकी वजह यह है कि यह एक आम समस्या है जो कि हर शहर में और हरेक धर्म-मत के मानने वालों को पेश आती है। जगह जगह ऐसे तंात्रिकों और रूहानी आमिलों की दुकानें खुली हुई हैं जो ख़ुद को काले इल्म का माहिर बताते हैं और जिन्न और जादू का इलाज करने का दावा करते हैं। वे आम जनता को साधना और सिद्धि की ऐसी कहानियां सुनाते हैं। जिन्हें सुनकर आम लोग यह समझते हैं कि इतनी कठिन साधना तो वे कर नहीं सकते। लिहाज़ा अपना कष्ट हम ख़ुद दूर नहीं कर सकते। यही बाबा लोग हमारे कष्ट दूर कर सकते हैं। ये मुफ़्तख़ोर ढकोसलेबाज़ समाज का कष्ट दूर नहीं करते बल्कि उसका कष्ट बढ़ा रहे हैं। जो आदमी मालिक से दुआ करने में सक्षम है, वह अपना कष्ट स्वयं दूर करने में सक्षम है। अपनी दुआ कम लगे तो अपने मां-बाप से अपने लिए दुआ करवाए। उनकी सेवा करे। फिर भी कष्ट दूर न हो तो किसी अनाथ, विधवा, बीमार या किसी ग़रीब की मदद कर दे। उसकी आत्मा से जो दुआ निकलेगी। वह आपके कष्ट दूर होने का बहुत मज़बूत वसीला बनेगी।
तर्कशील बुद्धिजीवी ईश्वर, आत्मा और जिन्न आदि के वुजूद को नकारते हैं लेकिन भारत का हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई उनकी बात को स्वीकार नहीं कर सकता। भारत की प्रकृति में ही अध्यात्म रचा बसा है। नास्तिक दार्शनिकों ने हज़ारों साल कोशिश की है लेकिन वे भारत की प्रकृति को नहीं बदल सके। अब तक नहीं बदली है तो आगे भी नहीं बदलेगी और बदलने की ज़रूरत भी नहीं है।
असल कोशिश यह करनी है कि धंधेबाज़ धर्म और अध्यात्म को व्यापार और ठगी का ज़रिया न बनाएं। परंपरा और अनुष्ठान के नाम पर किसी की जान माल बर्बाद न होने पाए। कष्ट से मुक्ति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए लोगों को ज़िक्र, दुआ और ध्यान के आसान तरीक़े की शिक्षा दी जाए। जिसे वे बिना किसी पीर-पुरोहित के ख़ुद अन्जाम दे सकें।

दुआ, सबसे आसान और सबसे बड़ा अमल है
हाज़िरात के जिस तरीक़े का हमने ज़िक्र किया है। उसे हरेक आदमी ख़ुद कर सकता है। इसे मुसलमान ही नहीं बल्कि हिन्दू भाई बहन भी कर सकते हैं। जो लोग हाज़िरात के अमल को समझ ही न पाएं। वे भी इन दुआओं से लाभ उठा सकते हैं। ऐसे लोग केवल क़ुरआन की सूरतों को पढ़कर उस पैदा करने वाले रब से सच्चे दिल से लौ लगाएं और सिर्फ़ उसी से कष्ट दूर होने की प्रार्थना कर लें। किसी मौअक्कल को कोई हुक्म देने की ज़रूरत नहीं है। वह मालिक इससे भी ज़्यादा आपके लिए ख़ुद ही कर देगा।
जो लोग क़ुरआन की सूरतें नहीं पढ़ सकते। वे केवल पक्के यक़ीन के साथ ‘बिस्मिल्लाहिर्-रहमानिर्-रहीम‘ का जाप करें। उन्हें वे सब लाभ मिलेंगे जो कि क़ुरआन की किसी दूसरी आयत से मिलते हैं। शुरू और बाद में चंद बार दुरूद शरीफ़ ज़रूर पढ़ें- ‘अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिंव व अला आलिहि वसल्लम‘  
आप किसी भी दुआ को अपने वक़्त के हिसाब से कितना भी कम या कितना भी ज़्यादा पढ़ सकते हैं। जितना भी पढ़ें, दिल को हाज़िर करके पढ़ें।

सिर्फ़ दुआ काफ़ी है
हाज़िरात की ज़रूरत ही नहीं है। हम ख़ुद हरेक मरीज़ पर हाज़िरात नहीं करते। इसमें वक़्त बहुत लगता है और मरीज़ पर ज़ोर भी पड़ता है। हम हाज़िरात बहुत कम करते हैं। अक्सर हम परेशान लोगों के लिए  सिर्फ़ दुआ करते हैं।
ईद के बाद 11 अगस्त 2013 को इतवार के रोज़ हम ठाकुर श्री वीर सिंह जी की तबियत पूछने के लिए गए तो वहां हमने सिर्फ़ दुआ की और अल्लाह का शुक्र है कि उन्होंने फ़ौरन फ़ायदा महसूस किया।

महंगा इलाज सबके बस की बात नहीं है
श्री वीर सिंह जी का बेटा शैलेन्द्र 8वीं क्लास में हमारे बेटे के साथ पढ़ता है। वह ईद मिलने के लिए हमारे घर आया। हमने महसूस किया कि उसके अन्दर से बच्चों वाली शोख़ी ग़ायब है। उससे हमने कुछ खाने के लिए कहा तो भी उसकी तरफ़ से गंभीर अन्दाज़ जवाब मिला। ऐसी गंभीरता तो तब आती है जब इंसान ज़माने की सख़्तियाँ झेल रहा होता है। हमने उससे बात की तो शैलेन्द्र ने बताया कि उसके पापा एक साल से बीमार हैं। उनका लिवर फ़ेल हो चुका है। डॉक्टर ने उनके लिवर का सैंपल अमेरिका भेजा। अमेरिका से रिपोर्ट आने के बाद डॉक्टर ने कहा है कि पापा का लिवर ट्राँसप्लाँट किया जाएगा। इसमें 10 करोड़ रूपये का ख़र्च आएगा। 
अब हमारी समझ में सारा माजरा आ गया। शैलेन्द्र के पापा सड़क बनाने के सरकारी ठेकेदार हैं लेकिन 10 करोड़ ख़र्च करना उनके लिए मुश्किल हो रहा है। हालात जिस तरफ़ बढ़ रहे थे। वह शैलेन्द्र के लिए बेहतर नहीं थे। हमने अपनी मौत को याद किया। हमारी मौत के बाद हमारे छोटे छोटे बच्चे किन परेशानियों का सामना करेंगे। लम्हे भर में ही पूरी तस्वीर हमारे सामने आ गई। हमने शैलेन्द्र को तसल्ली दी और कहा कि बिना किसी ऑप्रेशन और ख़र्च के ही आपके पापा ठीक हो जाएंगे। हमने उसे अल्लाह के 2 नाम ‘या मुहयी या मुईद‘ लिखकर दिए और कहा कि आप इन नामों के साथ उस रब से दुआ करना।
अगले दिन शैलेन्द्र अपनी बड़ी बहन के साथ हमें बुलाने के लिए आया लेकिन उस दिन हम सैयद जावेद अहमद एडवोकेट साहब से मिलने के लिए गए हुए थे। हम इतवार के रोज़ दरोग़ा जी अकबर से ईद मिलने के लिए सुशीला विहार गए। उनके पास ही ठाकुर श्री वीर सिंह जी की कोठी है। हम उनकी ख़ैरियत दरयाफ़्त करने लिए भी चले गए। हमारे साथ हमारी बेटी भी थीं।

ठाकुर के लिए पठान की दुआ
शैलेन्द्र के माता पिता ने हमारा इस्तक़बाल किया। वीर सिंह जी ने बताया कि उन्होंने ज़िन्दगी में शराब को चखा तक नहीं है। उन्हें न्यूमानिया हुआ था। उसी की वजह से उनका लिवर ख़राब हुआ है। लिवर ख़राब होने के बाद अब उन्हें डायबिटीज़ भी हो गई है। उस वक्त उनका पेट पूरी तरह तना हुआ था। 
हमने उनसे कहा कि अगर आप चाहें तो हम आपकी सेहत के लिए दुआ कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि हम आपको इसीलिए तो बुलाना चाहते थे।
हमने अल्लाह से दुआ की। हम बा-आवाज़े बुलन्द 20 मिनट से ज़्यादा दुआ करते रहे। दुआ के बाद वीर सिंह जी ने बताया कि उनका पेट कुछ हल्का महसूस हो रहा है। हमने उन्हें वैद्य जी नरेश गिरी से आयुर्वेदिक ट्रीटमेन्ट लेने की सलाह दी। वह गिरी जी से तो मिलने नहीं गए लेकिन वह अल्लाह के दोनों नाम ‘या मुहयी या मुईद‘ पढ़कर दुआ करते रहे। 
वीर सिंह जी का कोई फ़ोन नहीं आया तो हमने अपने बेटे से पूछा कि शैलेन्द्र के पापा की तबियत अब कैसी है ?
उन्होंने कहा कि शैलेन्द्र उनके बारे में कुछ ज़िक्र नहीं करता। हमने कहा कि शैलेन्द्र की कैफ़ियत बताओ। उसी से अन्दाज़ा हो जाएगा। उन्होंने बताया कि वह तो हंसी-मज़ाक़ और शरारतें करने लगा है। हमने कहा कि बच्चा अपनी नेचर पर लौट आया है। इसका मतलब है कि उसके पापा की तबियत ठीक हो रही है।
अगले दिन हमारे बेटे ने स्कूल में शैलेन्द्र से उसके पापा तबियत पूछी तो उसने बताया कि दुआ के दो-चार दिन बाद ही मेरे पापा के मुंह के रास्ते से 2-3 लीटर पानी निकला और पेट की तकलीफ़ दूर हो गई।
अगर वह बताए गए तरीक़े से दुआ करते रहे तो इन्शा अल्लाह वह पूरी तरह ठीक हो जाएंगे।

अभी हम इस लेख को आखि़री शक्ल देकर नाश्ता कर रहे थे कि पंडित राजबल शर्मा जी की वाइफ़ तशरीफ़ ले आईं। पंडित राजबल शर्मा पड़ोस में रहते हैं और पुलिस विभाग में काम करते हैं।
नौ माह पहले उनके घर एक पोता पैदा हुआ थां। वह स्पाईना बायफ़िडा नाम की बीमारी का मरीज़ था। तब उनके बुलाने पर हम उसे देखने के लिए गए थे और उन्हें दुआ करने और चिड़िया को दाना डालने की बात बताई थी। उस बच्चे का नाम हमने नूह रखा था। कुछ दिन बाद ही बच्चे की हालत में कुछ सुधार होने लगा। एक दिन हमारे बच्चों ने बताया कि उन्होंने बच्चे का नाम कुछ और रख दिय है। हम तभी खटक गए थे।
आज दिनांक 2 सितम्बर को वह परेशानी की हालत में फिर हमारे पास आई थीं। मग में थोड़ा सा दूध अभी बाक़ी था। जिसे हम नमाज़ वाली चौकी पर बैठकर पी रहे थे। हमने उन्हें कुर्सी पर बैठने के लिए कहा और नाश्ते के लिए पूछा।
उन्होंने इनकार कर दिया और उन्होंने अपनी परेशानी बयान की। उनकी परेशानी को बयान किया जाए तो सुम्बुल के वाक़ये से ज़्यादा बड़ा लिखना। लिहाज़ा उसे किसी और वक़्त के लिए छोड़ दिया जाता है।
तब तक आप शहद की रॉयल जैली के बारे में पढ़ें। जो कि एक बेहतरीन दवा है। जिस लारवा को रॉयल जैली खिलाई जाती है। वह रानी मक्खी बनकर बड़ा होता है और ज़िन्दगी भर अपने समाज की अगुवाई करता है और उन पर राज करता है।
क़ुरआन में मधुमक्खी का ज़िक्र बड़ी तफ़्सील के साथ आया है और उसके पेट से निकले हुए शहद की तारीफ़ करते हुए उस मालिक ने कहा है कि उसमें शिफ़ा है।

Saturday, July 4, 2015

Allahpathy अल्लाह कुर'आन की शक्ति से देता है शिफ़ा (आरोग्य) हर बीमारी से, Allah The Best Healer,

हम कुर'आन में से जो उतारते है वह मोमिनों के लिए शिफ़ा (आरोग्य) और दयालुता है, किन्तु ज़ालिमों के लिए तो वह बस घाटे ही में ज़्यादती करता है. (क़ुर'आन 17:82) 

कुर'आन शिफ़ा है और कुर'आन में शिफ़ा है लेकिन लोग क़ुर'आन पर ध्यान न देकर अपने आप पर खुद ही ज़ुल्म कर रहे हैं और घाटा उठा रहे हैं।
अल्लाह ने लोगों की बीमारियों का इलाज क़ुर 'आन में रखा है। लोगों के कष्ट दूर करने के लिए ही अल्लाह ने समय समय पर अपने पैग़म्बर भेजे और उनमें से कुछ का ज़िक्र अल्लाह ने ख़ास तौर से अपने कलाम में किया है। इनमें से एक पैगम्बर थे हज़रत  अय्यूब अलैहिस-सलाम। सब्र के गुण के लिए आज भी उनकी मिसाल दी जाती है। जब पैग़म्बर हज़रत  अय्यूब अलैहिस-सलाम बीमार हुए और बहुत लम्बे अरसे तक बीमार रहे तो एक रोज़ उन्होंने अल्लाह से दुआ की। 
क़ुर'आन में दो जगह पर उनकी दुआ का ज़िक्र आया है-

हमारे बन्दे अय्यूब को भी याद करो, जब उसने अपने रब को पुकारा कि "शैतान ने मुझे दुख और पीड़ा पहुँचा रखी है।" (41) "अपना पाँव (धरती पर) मार, यह है ठंडा (पानी) नहाने को और पीने को।" (42)
(सूरह ए साद )

और अय्यूब पर भी दया दर्शाई। याद करो जबकि उसने अपने रब को पुकारा कि "मुझे बहुत तकलीफ़ पहुँची है, और तू सबसे बढ़कर दयावान है।" (83) अतः हमने उसकी सुन ली और जिस तकलीफ़ में वह पड़ा था उसको दूर कर दिया, और हमने उसे उसके परिवार के लोग दिए और उनके साथ उनके जैसे और भी दिए अपने यहाँ दयालुता के रूप में और एक याददिहानी के रूप में बन्दगी करनेवालों के लिए (84)
(सूरह अल-अम्बिया)
इस तरह अल्लाह ने पैग़म्बर हज़रत  अय्यूब अलैहिस-सलाम के ज़रिये सारी इंसानियत को यह तालीम दी कि अगर तुम अपने पैदा करने वाले रब पर ईमान रखते हो और सब्र कर सकते हो तो तुम्हारे रोग को दूर करने वाली दिव्य औषधि पहाड़ी चश्मे का बहता हुआ ताज़ा ठंडा पानी है।

अगर पानी का इस्तेमाल हिकमत के साथ किया जाए तो वह तमाम बीमारियों को दूर कर सकता है। मॉडर्न साइंस भी यह क़ुबूल करती है. अल्हम्दुलिल्लाह। 
इस सम्बन्ध में Dr . Batmanghelidj का एक क़ीमती लेख प्रस्तुत है- 



The Wonders of Water: Amazing Secrets for Health and Wellness

Water prevents and helps to cure heartburn.

Heartburn is a signal of water shortage in the upper part of the gastrointestinal tract. It is a major thirst signal of the human body. The use of antacids or tablet medications in the treatment of this pain does not correct dehydration, and the body continues to suffer as a result of its water shortage.

Not recognizing heartburn as a sign of dehydration and treating it with antacids and pill medications will, in time, produce inflammation of the stomach and duodenum, hiatal hernia, ulceration, and eventually cancers in the gastrointestinal tract, including the liver and pancreas.

Water prevents and helps to cure arthritis.

Rheumatoid joint pain - arthritis - is a signal of water shortage in the painful joint. It can affect the young as well as the old. The use of pain-killers does not cure the problem, but exposes the person to further damage from pain medications. Intake of water and small amounts of salt will cure this problem.


Water prevents and helps to cure back pain.

Low back pain and ankylosing arthritis of the spine are signs of water shortage in the spinal column and discs - the water cushions that support the weight of the body. These conditions should be treated with increased water intake - not a commercial treatment, but a very effective one. 

Not recognizing arthritis and low back pain as signs of dehydration in the joint cavities and treating them with pain-killers, manipulation, acupuncture, and eventually surgery will, in time, produce osteoarthritis when the cartilage cells in the joints have eventually all died. It will produce deformity of the spine. It will produce crippling deformities of the limbs. Pain medications have their own life-threatening complications.


Water prevents and helps to cure angina.

Heart pain - angina - is a sign of water shortage in the heart/lung axis. It should be treated with increased water intake until the patient is free of pain and independent of medications. Medical supervision is prudent. However, increased water intake is angina's cure.


Water prevents and helps to cure migraines.

Migraine headache is a sign of water need by the brain and the eyes. It will totally clear up if dehydration is prevented from establishing in the body. The type of dehydration that causes migraine might eventually cause inflammation of the back of the eye and possibly loss of eye sight.


Water prevents and helps to cure colitis.

Colitis pain is a signal of water shortage in the large gut. It is associated with constipation because the large intestine constricts to squeeze the last drop of water from the excrements - thus the lack of water lubrication. 

Not recognizing colitis pain as a sign of dehydration will cause persistent constipation. Later in life, it will cause fecal impacting: it can cause diverticulitis, hemorrhoids and polyps, and appreciably increases the possibility of developing cancer of the colon and rectum.


Water and salt prevent and helps to cure asthma.

Asthma, which also affects 14 million children and kills several thousand of them every year, is a complication of dehydration in the body. It is caused by the drought management programs of the body. In asthma free passage of air is obstructed so that water does not leave the body in the form of vapor - the winter steam. Increased water intake will prevent asthma attacks. Asthmatics need also to take more salt to break the mucus plugs in the lungs that obstruct the free flow of air in and out of the air sacs. 

Not recognizing asthma as the indicator of dehydration in the body of a growing child not only will sentence many thousands of children to die every year, but will permit irreversible genetic damage to establish in the remaining 14 million asthmatic children.


Water prevents and helps to cure high blood pressure.

Hypertension is a state of adaptation of the body to a generalized drought, when there is not enough water to fill all the blood vessels that diffuse water into vital cells. As part of the mechanism of reverse osmosis, when water from the blood serum is filtered and injected into important cells through minute holes in their membranes, extra pressure is needed for the "injection process." Just as we inject I.V. "water" in hospitals, so the body injects water into tens of trillions of cells all at the same time. Water and some salt intake will bring blood pressure back to normal! 

Not recognizing hypertension as one of the major indicators of dehydration in the human body, and treating it with diuretics that further dehydrate the body will, in time, cause blockage by cholesterol of the heart arteries and the arteries that go to the brain. It will cause heart attacks and small or massive strokes that paralyze. It will eventually cause kidney disease. It will cause brain damage and neurological disorders, such as Alzheimer's disease.


Water prevents and helps to cure early adult-onset diabetes.

Adult-onset diabetes is another adaptive state to severe dehydration of the human body. To have adequate water in circulation and for the brain's priority water needs, the release of insulin is inhibited to prevent insulin from pushing water into all body cells. In diabetes, only some cells get survival rations of water. Water and some salt will reverse adult-onset diabetes in its early stages. 

Not recognizing adult-onset diabetes as a complication of dehydration will, in time, cause massive damage to the blood vessels all over the body. It will cause eventual loss of the toes, feet and legs from gangrene. It will cause eye damage, even blindness.


Water lowers blood cholesterol.

High cholesterol levels are an indicator of early drought management by the body. Cholesterol is a clay-like material that is poured in the gaps of some cell membranes to safeguard them against losing their vital water content to the osmotically more powerful blood circulating in their vicinity. Cholesterol, apart from being used to manufacture nerve cell membranes and hormones, is also used as a "shield" against water taxation of other vital cells that would normally exchange water through their cell membranes.


कैंसर, डायबिटीज़ और हरेक लाइलाज बीमारी का इलाज पानी है .
कैसे ?
इसे किसी अगली किस्त में बताया जाएगा।
(जारी---)