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By Hazrat Hakeem Mohammad Tariq Mahmood Chughtai Dear Readers! I Bring to you precious pearls and do not hide anything, you shou...

Wednesday, February 9, 2022

बेडरूम में सफलता का उपदेश: ख़ुशी बढ़ाएं, ग़म मिटाएं और अपनी ज़िंदगी से ज़ालिम हटाएं सिर्फ़ 'देखकर'

 बेडरूम में सफलता का उपदेश

कल मैंने अपने बेडरूम में अपने बच्चों को जमा करके उनकी एक क्लास ली। मैंने उनसे कहा कि बेटा आप मुझसे उर्दू और दीन सीख लो। जो बात मैं आपको बता दूंगा, वह आपको कोई दूसरा न बताएगा क्योंकि मुझे भी किसी ने ये बातें इतने कम वक़्त में नहीं बताईं। ये बातें जानने में मेरे 40 साल लग गए हैं।
फिर अकमल ख़ान,अमन ख़ान, अब्दुल्लाह ख़ान और एक बेटी को मैंने बैठा लिया। दो छोटी बेटियां अना इस्मुल्लाह (5 साल) और हया (3 साल)  खेलती हुई घर में भागी फिर रही थीं। उनकी समझ में ये बातें न आतीं।
बड़ा बेटा अनस ख़ान घर से बाहर किसी काम से गए थे और सबसे बड़ी बेटी स्टडी रूम में स्टडी कर रही थीं।
मैंने कहा कि जहाँ हम मौजूद हैं। इसके चारों तरफ़ यूनिवर्स में दूर दूर तक प्लैनैट्स फैले हुए हैं। अगर आप अपनी कल्पना में एक झाड़ू से इन सबको समेट लें और मिटा दें तो आपको अपनी कल्पना में क्या दिखेगा?
अकमल ने कहा कि बस स्पेस दिखेगा।
मैंने कहा कि ठीक है। इसे सूफ़ी ख़ला बसीत (दूर तक फ़ैला हुआ अंतरिक्ष) कहते हैं। अब आप इस स्पेस को भी मिटा दें और अगर कुछ भी शक्ल नज़र आए तो उसे भी हटा दें। ऐसा ही करते रहें यहाँ तक कि कल्पना में कोई रूप रंग या स्पेस भी नज़र न आए।
अब आपको अपनी कल्पना में क्या नज़र आ रहा है?
अकमल ने कहा कि कुछ भी नहीं।
मैंने कहा कि आप अपनी कल्पना में अब उस वक़्त तक पहुंच गए हो, जब यह दुनिया नहीं थी, कुछ भी नहीं था। तब भी अल्लाह (परमेश्वर) था। और वह अपने होने को जानता था कि '#मैं_हूँ'
मैंने कहा कि अल्लाह का नाम सुनकर आपके मन में क्या शक्ल बनी?
मेरे 10 साल के बेटे अमन ख़ान ने कहा कि एक रौशनी नज़र आ रही है।
मैंने कहा कि यह तुम्हारी कल्पना है। अल्लाह इस रौशनी जैसा नहीं है। जो तुम अपनी कल्पना में इस वक़्त देख रहे हो। अपनी इस कल्पना को मिटा दो।
उसके बारे में जो भी कल्पना हो, वह बस एक कल्पना है।  हर कल्पना से ध्यान हटा लो और इतना काफ़ी समझो कि 'वह' है। उसका होना ही हक़ है। हक़ वह है जो कभी नहीं बदलता।
फिर उसने चाहा कि वह अपनी पहचान के लिए दुनिया बनाए तो यह यूनिवर्स बना। फिर उसने इस फैले हुए यूनिवर्स को समेट कर एक छोटा रूप बनाया तो आदम (अलैहिस्सलाम) बने। अल्लाह ने उनमें अपनी रूह में से फूंका। इससे आदम अपने होने के प्रति कॉन्शियस हो गए कि मैं हूं। हमारी सबसे बड़ी दौलत यही 'मैं हूँ' है क्योंकि यह हक़ है। आदम की औलाद में भी हरेक के पास यह दौलत है। एक बच्चे को जवानी में और फिर उस जवान को बुढ़ापे में पहचानना मुमकिन नहीं है क्योंकि बच्चे की जवानी में और फिर बुढ़ापे में खाल, बाल और वज़न सब कुछ बदल जाता है। एक बच्चे की बुढ़ापे तक लगभग हर सेल (कोशिका) बदल जाती है लेकिन उसके अंदर 'मैं_हूँ' नहीं बदलता। उसे अपने बचपन में #पतंग उड़ाना याद रहता है। उसे हर उम्र में किए हुए अपने काम याद रहते हैं। इंसान में 'मैं हूँ' (#अहम्) रब की ज़ात का एक रेफ़्लेक्शन है, उसके गुणों का नहीं। जैसे आसमान में सूरज होता है लेकिन वह तालाब में भी दिखता है और हक़ीक़त में तालाब में सूरज होता नहीं लेकिन तालाब में दिखने वाला रेफ़्लेक्शन आसमान के सूरज से जुड़ा होता है कि अगर आसमान में सूरज न हो तो तालाब में भी सूरज न दिखे। इसी तरह इंसान ख़ुदा से, क्रिएटर गॉड से जुड़ा हुआ है। इंसान चाहे तो वह ख़ुद को देखकर ख़ुदा को पहचान सकता है।
हमें ख़ुदा से जुड़ना नहीं है क्योंकि हम उससे कटे हुए नहीं हैं। यह मुमकिन ही नहीं है कि हम उससे कट जाएं।
हमें ख़ुदा को तलाश नहीं करना है क्योंकि वह खोया नहीं ‌है। यह मुमकिन नहीं है कि ख़ुदा खो जाए और न यह मुमकिन है कि ख़ुदा हमें खो दे। हम ख़ुदा से जुड़े हुए हैं। हमें ख़ुदा मिला हुआ है। चाहे हमें पता हो या पता न हो। फ़र्क सिर्फ़ हक़ीक़त जानने और न जानने का है। हम जानें या न जानें हक़ीक़त यही रहेगी। जब यहाँ कुछ न था, तब ख़ुदा था और अब भी ख़ुदा है, जब यहाँ सब है और जब यह सब मिट जाएगा। तब भी ख़ुदा बाक़ी रहेगा।
कभी आपने सोचा है कि ये सब चीज़ें कहाँ हैं?
यह पूरा यूनिवर्स ख़ुदा के इल्म में है। वह इन्हें देख रहा है तो ये सब चीज़ें वुजूद में हैं। जैसे मैं चाहूं कि एक पहाड़ हो, उस पर हरियाली हो और उन पेड़ों के बीच में बहुत से हिरन खेल रहे हों तो मेरी कल्पना में पहाड़, पेड़ और हिरन, सब तुरंत बन जाते हैं और जब तक मैं उन्हें देखता रहता हूँ, वे चीज़ें बाक़ी रहती हैं और जब मैं उनसे अपनी तवज्जो हटा लेता हूँ तो वे सब चीज़ें मिट जाती हैं। मेरे देखने से जो चीज़ें बनीं, वे मेरे देखने पर ही निर्भर हैं। ऐसे ही यह यूनिवर्स और इसकी हर चीज़ ख़ुदा के इल्म (ज्ञान) में है और यह उस अल्-मुसव्विर की कल्पना से बनी है। यह उस अश्-शहीद (गवाह, साक्षी) के देखने से ही क़ायम है। उसी के विचार से सबसे पहले एक नेब्युला बना और फिर उसमें गति हुई। उस गति से वाईब्रेशन/लहरें, लहरों से कण और कणों से परमाणु बने। परमाणु मिले तो अणु बने। अणु दूर थे तो गैस बनी। अणु क़रीब आए तो द्रव बना। अणु और ज़्यादा क़रीब आए तो ठोस पदार्थ बने। एक ही विचार तरंग से एनर्जी बनी और एक ही एनर्जी से गैस, द्रव और ठोस हर चीज़ बन गई।
ख़ुदा को कुछ बनाना होता है तो वह सिर्फ़ चाहता है कि ऐसा हो और फिर वैसा होने का सिलसिला शुरू हो जाता है और एक मुद्दत बाद अपने ठीक वक़्त पर वह चीज़ बन जाती है, जो वह बनाना चाहता है।
यह पूरी कायनात महज़ इल्मी चीज़ है। जिसे ख़ुदा जान रहा है तो इसका वुजूद है। हर चीज़ उसके इल्म के घेरे में है।
यानी अब भी हक़ीक़त में सिर्फ़ वही है। वही हक़ है।
#हुवा_अल्-हक़
हक़ की तजल्ली (रेफ़्लेक्शन/विभूति) तुम्हारे अंदर है। जो कभी नहीं बदलती। इसीलिए तुम कभी अपने 'न होने' की कल्पना नहीं कर सकते। यह चेतना मास्टर की (master key) है। जो कुछ तुम इस चेतना में रखते हो। वह हालात बनकर बाहर आता रहता है। तुम इसमें मुहब्बत रखते हो तो मुहब्बत बाहर छलकती है और तुम इसमें नफ़रत रखते हो नफ़रत बाहर छलकती है। तुम्हारी आदतन सोच से तुम्हारे अंदर #साँचे #moulds बनते हैं। यूनिवर्सल एनर्जी तुम्हारी सोच के साँचों में ढलकर हालात के रूप में तुम्हारे सामने आती रहती है। तुम्हारे अंदर #मुहब्बत, माफ़ी, #मदद, #शुक्र, सब्र और ख़ुशी की #आदतन_सोच होगी तो यूनिवर्सल एनर्जी उनमें ढलकर उन्हीं के मुताबिक़ हालात बनाएगी और तुम्हें अपने हालात में अपने अंदर की भावनाएं नज़र आएंगी। तुम्हारे अंदर #नफ़रत, ग़ुस्सा, लालच, शक, मायूसी, #डर और #ग़म होंगे तो वे सब तुम्हारे हालात में रेफ़्लेक्ट होंगे। यह तय‌ है। तुम अपने हालात अच्छे बनाना चाहते हो तो इसकी शुरुआत आप अपने अंदर के आदतन विचार और भावनाएं बदलने करें तो आपको #सफलता मिल जाएगी।
हमारी चेतना नए डायमेंशन में जा रही है। जैसे हम सोते हैं तो हमें सपना हक़ीक़त लगता है और जब हम जागते हैं तो सपना एक #कल्पना लगता है और यह दुनिया हमें हक़ीक़त लगती है क्योंकि यह हमें पाँच सेंसेज़ से फ़ील होती है। ...लेकिन सपने के मुक़ाबले यह दुनिया ज़्यादा स्थायी है और जब हम मर जाएंगे तो हम एक ऐसे डायमेंशन में जागेंगे, जो दुनिया के मुक़ाबले ज़्यादा बेहतर और ज़्यादा स्थायी    (ख़ैरुंव व अब्क़ा) होगा।
तब दुनिया की ज़िन्दगी एक सपना लगेगी और जो इस दुनिया में बेईमान और ज़ालिम बने थे, वे‌ पछताएंगे कि हाय, हम महज़ काल्पनिक चीज़ों पर ही रीझकर बेईमान हो गए और ज़ुल्म कर बैठे। ... लेकिन वे अपने कर्मों को भुगतेंगे क्योंकि उनके कर्मों से उनके विचार और उनकी भावनाएं उनके और सबके सामने आ गई होंगी और इस दुनिया का मक़सद यही है कि हरेक अपने आपको अपने कर्मों के आईने में पहचान ले। जैसे हरेक पेड़ अपने फलों से पहचाना जाता है। वैसे ही हरेक आदमी अपने कर्म से पहचाना जाता है‌।
तुम्हारे कर्म अच्छे हों, इसके लिए तुम्हें डर व ग़म से, ग़ुस्से व लालच से दिल पाक रखना होगा। तुम जल्दबाज़ी न करना और जब अच्छे काम करो तो कभी शक न करो कि इनसे कुछ भला होगा या नहीं? और न ही कभी मायूस होओ कि अब तक कुछ नतीजा नहीं मिला। कहीं ये सब काम बेकार तो नहीं जा रहे हैं।
हरगिज़ नहीं।
हर बीज अपने मौसम पर फूटता है और हर पेड़ अपने मौसम पर फल लाता है। जब धूल की परतें जमा होकर चट्टान बनती हैं तो उन चट्टानों में कुछ बीज दब जाते हैं। फिर चाहे लाख साल गुज़र जाएं तो भी वे बीज अपने वक़्त पर फूटकर बाहर निकलते हैं और उन पर फूल और फल आते हैं। मैं जब देहरादून, मसूरी, जम्मू और श्रीनगर के पहाड़ों पर गया तो मैंने पहाड़ी जंगल की ठोस चट्टानों के अंदर से पेड़ निकलते देखे।
जैसा बीज था वैसा ही पेड़ निकला। कंटीले पेड़ के बीज से कंटीला पेड़ निकला और फलदार पेड़ के बीज से फलदार पेड़ निकला।
तुम्हारे दिल के विश्वास वे‌ बीज हैं, जिनसे तुम्हारे कर्मों के पेड़ और फल निकलेंगे। तुम काँटे चाहते हो तो जो चाहे करो और तुम अच्छे फल (फ़लाह, कल्याण) चाहते हो तो तुम अपने दिल में अच्छे विश्वास जमाओ।
जिन बातों को तुम बार-बार सुनते और बोलते हो, वे नेचुरली तुम्हारे दिल के विश्वास #subconsciousbeliefs बन जाते हैं।
इसीलिए बार बार नमाज़ और नमाज़ में क़ुरआन और दुआएं पढ़ी जाती हैं ताकि तुम्हारे #अवचेतन_मन के विश्वास अच्छे हो जाएं। इसी को दीन में ईमान कहते हैं। #अल्लाह पर ईमान रखो और अपने #ईमान को अच्छा बनाओ। एक वक़्त पर हर चीज़ तुम्हारे पक्ष में आकर खड़ी हो जाएगी, इन् शा अल्लाह!
हरेक अपने ईमान में जीता है और उसी में वह मरता है।
जो ईमान रखता है कि मैं ग़रीब हूँ, मैं मज़लूम हूँ। फिर वह अमीर बनने और इंसाफ़ पाने कोशिश और दुआ करता है तो उसकी कोशिश और दुआ को उसका ईमान फ़ेल कर देता है और वह ग़रीबी में और पीड़ा में जीता है। उस पर ज़ालिम मुसल्लत रहते हैं। वह ग़रीबी में ज़ुल्म सहता हुआ ही मर जाता है। अगर उसकी मेहनत से उसके पास कुछ रूपया आ जाता है तो वह उसके पास नहीं रुकता। वह अपनी आत्मा के विश्वास के अनुसार ग़रीब ही रहता है। ग़रीबी के हालात मानसिक नज़रिए से आ रहे हैं। मानसिक नज़रिए को बदलकर ग़रीबी की जड़ काटी जा सकती है। ग़रीबी एक मानसिक रोग है।‌ ऐसे ही मज़लूम होने के एहसास #victimhood में जीना एक #मानसिक_रोग है और इससे वही हालात और ज़्यादा पैदा होते हैं। इससे ज़ालिम को क़ाबू मिलता है क्योंकि अपने मज़लूम होने का यक़ीन ज़िन्दगी में ज़ालिम को दावत देता है कि आ जाओ। मेरा #नज़रिया तुम्हारी डिमांड करता है। इस डिमांड को रोक दो। ज़ालिम की सप्लाई रुक जाएगी क्योंकि यह दुनिया डिमांड और सप्लाई के रूल पर चल रही है।
यह #क़ानूने_क़ुदरत है। अपनी ज़िंदगी में क़ुदरत के क़ानून की प्रैक्टिस करो।
नेमतों पर शुक्र करके ग़रीबी को और ज़ालिम की डिमाँड को रोका जाता है।
रब ने सूरह फ़ातिहा में शुक्र करना सिखाया है। सूरह फ़ातिहा नज़रिए को सही करती है।
इसीलिए सूरह फ़ातिहा में #शिफ़ा की शक्ति #healingpower है।
*पार्ट 2*

देखने की 2 तकनीकें
पिछली पोस्ट से आगे....
#ख़ुशहाली पाने और #ग़म दूर करने का तरीक़ा है ख़ास तरीक़े से देखना
पिछली पोस्ट लंबी थी, जिसमें मैंने आपको बताया है कि इंसान की #चेतना #ख़ुदी असल दौलत है और उसके हालात उसमें मौजूद विश्वासों और जज़्बातों का रेफ़्लेक्शन और साया हैं।
...और साये बदलते रहते हैं। आपको इन्हें बदलने की ताक़त देकर पैदा किया गया है। आपके हालात आपकी चेतना के अधीन हैं।
मैं आपको बता चुका हूँ कि क्रिएटर का एक नाम #अरबी में अश्-शहीद और #संस्कृत में #साक्षी है यानि देखने वाला गवाह। उसने देखने से ही यह दुनिया क्रिएट कर दी। आपके देखने से भी असर पड़ता है और आपके देखने से आप अपने हालात भी बदल सकते हैं।
देखने के 2 तरीक़े हैं:
1. किसी घटना को फ़र्स्ट पर्सन में ऐसे देखना मानो आप ख़ुद उसे भोग रहे हैं। (embodiment of your desire)

पूरी तरह #रिलैक्स्ड होकर पांचों सेंसेज़ से उसे रीयल फ़ील करना। यह तरीक़ा मैं लिख चुका हूँ। यह तब किया जाता है, जब किसी ग़रीब को अमीर, किसी बीमार को सेहतमंद और किसी बाँझ औरत को माँ बनना हो। जब किसी बदहाल को ख़ुशहाल बनना हो। 

2. किसी घटना को सेकंड पर्सन में ऐसे देखना मानो आप उस घटना से अलग हैं। (looking at yourself from a distance)

जब किसी ग़म को मिटाना हो तो इस तरीक़े से देखा जाता है।
मान लीजिए एक औरत को तलाक़ हो गया या किसी लड़की ने अपने माँ-बाप से छिपकर किसी लड़के से #फ़िल्मी स्टायल में टूटकर दिलोजान से #इश्क़ किया और यह #गुमान किया कि उसका #आशिक़ उसे बहुत चाहता है और वह उससे #शादी भी करेगा लेकिन वह लड़का अपना काम निकालकर किसी और लड़की की इज़्ज़त ठगने के मिशन पर निकल गया और अब इस तलाकशुदा या इस लुटी हुई  लड़की को ग़म खाए जा रहा है। किसी तरह इसका ग़म कम नहीं  हो रहा है। यह हर वक़्त ख़ुद को कोस रही है। हर वक़्त #shame #guilt #selfcriticism में पड़ी है। तब वह अपने आपको इस ख़ास तरीक़े से देखे मानो वह अपने आप से 3-4 मीटर दूर खड़ी है और अपने आपको देख रही है कि वह किस तरह सोग मना रही है। सिर्फ़ देखना है। कुछ और नहीं करना है। न कोई दुआ पढ़नी है। बस अपनी हालत को एक गवाह के रूप में देखना है। लगातार कुछ दिन इस तरह देखने से ग़म कम होता जाएगा और फिर ग़म पूरी तरह मिट जाएगा। लड़की नॉर्मल ज़िंदगी की तरफ और अपनी खुशियों की तरफ लौट आएगी।

#atmanirbharta_coach  
#शिफ़ा #bedroom_science #मानसिक_रोग #नज़रिया
#नॉर्मल_नागरिक_कांसेप्ट #अल्लाहपैथी #allahpathy 

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