Featured Post

Allahpathy:THE BLESSING MONEY BAG THAT WOULD HELP EVERYONE TO BE RICH IN THE MONTH OF RAMADAN

By Hazrat Hakeem Mohammad Tariq Mahmood Chughtai Dear Readers! I Bring to you precious pearls and do not hide anything, you shou...

Tuesday, April 12, 2016

Symbolic Story, Allahpathy ‘नीम’ हकीम साहिब का तरीक़ा ए इलाज (लुत्फि़या सबक़)

हमने रात बेसब्री से काटी और सुबह को उठकर पानी में भिगोए हुए पांच अंजीर खाए। पेट साफ़ हो गया। नाश्ते में तलबीना खाया और मिस्वाक करके बिन्ते हव्वा से अम्बर की ख़ुश्बू लगवाई और हमने अपनी बीवी का शुक्रिया अदा करके हकीम साहिब के नीम तले वाले दवाख़ाने की तरफ़ रवाना हो गए।

उनका दवाख़ाना सुबह सुबह ही खुल जाता है। वह कहते हैं कि इससे रोज़ी में बरकत होती है। हमने देखा कि चार-पांच मरीज़ हैं और उनका एक असिस्टेंट हावन दस्ते में दवाएं कूट रहा है। हकीम साहिब मरीज़ों को फ़ारिग़ करके ‘मक्तूबाते मुजद्दिी रह.’ पढ़ रहे हैं, आराम से। वह हार्ड वर्क नहीं करते। उनका कहना है कि जैसे जैसे इल्मो हिकमत बढ़ता जाता है, वैसे वैसे रोज़ी के लिए बदन की मशक़्क़त कम होती चली जाती है।
हमने तरीक़े के मुताबिक़ सलाम अजऱ् किया। वो बड़ी अदा से मुस्कुराए। उनकी उम्र कोई ज़्यादा नहीं है। काफ़ी प्रोडक्टिव भी हैं। सात-आठ बच्चे हैं, मा शा अल्लाह! वैसे भी ये हकीम और होम्योपैथ कभी बूढ़े नहीं होते। हकीम तो जवारिश जालीनूस, माजून आरदे ख़ूरमा और हलवा घीक्वार खाते रहते हैं और होम्योपैथ जिनसेंग और डेमियाना। नीम हकीम साहिब को तो ये दोनोें ही तरीक़ा ए इलाज मालूम थे। हम ख़ुद अपनी गृहस्थी उनकी दुआ और दवा की बरकत से खींच रहे थे।
हमने बड़े अदब से अजऱ् किया कि हज़रत कल एक बात अधूरी रह गई थी। आपने कहा था कि आप कल बताएंगे कि चांदी चाचा आपका नाम आते ही इतना ख़फ़ा क्यों हो जाते हैं? जबकि वह आपको अपने घर पर एक बार दावत भी खिला चुके हैं और हमने उस दावत के फ़ोटो व्हाट्सएप पर देखे थे आपके ग्रुप पर।
हकीम साहिब ने फ़रमाया कि भाई, बात दरअसल यह है कि चांदी चाचा में छल कपट नहीं है। इनका पूरा घर ही नेक शरीफ़ और भोला भाला है। ये भोले इतने ज़्यादा हैं कि अगर चार लोग हमें मसीहा कह दें तो ये भी मान लेंगे कि हम मसीहा हैं और अगर इनके मिलने वाले चार लोगों का इज्मा हो जाए कि हकीम साहिब मश्कूक हैं तो ये भी मश्कूक हो जाएंगे।
दिलपुर में जब हमारा पहला लेक्चर हुआ तो यह हमें बस अड्डे तक बाइक से छोड़ने आए थे। चांदी चाचा ने हमें बड़ी इज़्ज़त दी थी। तब उन्होंने हमें बताया कि उनकी बेगम उन्हें छोड़कर अपने मायक़े चाक़ूपुर में जा बैठी हैं अपनी मां के पास। महीने हो गए हैं चार। मैं सोच रहा हूं कि उन्हें तलाक़ दे दूं।
तब हमने उन्हें आधा घंटे वहीं सड़क पर खड़े हो कर समझाया था कि यह ‘ख़याल’ अपने दिल से निकाल दो। इस तरह के हालात निकाह के बाद आते हैं और जब उन्हें नरमी से हैंडल किया जाता है तो वे हल हो जाते हैं और फिर लाइफ़ ख़ुशगवार गुज़रती है।
हमने उन्हें कुछ ऐसी बातें मज़ीद बताईं जिनसे मियां-बीवी में मुहब्बत बढ़ती है। फिर एक बार जयपुर से लौटते वक़्त हम इनके घर गए ताकि हम चांदी चाचा के दिल को मज़ीद तक़कियत दें। उसी दिन उन्होंने हमें मुगऱ् खिलाया था, जिसके फ़ोटो दुनिया ने देखे थे। उस फ़ोटो में चांदी चाचा मा शा अल्लाह बहुत प्यारे नज़र आ रहे थे। हो सकता है कि उसे देखकर ही किसी की नज़रे बद लग गई हो हमारे रिश्ते को।
‘फिर बीवी लौटी क्या हकीम साहिब?’-हमने तजस्सुस के साथ पूछा।
‘हां, लौट आई। अल्लाह का शुक्र है। बिछड़ों को मिलाना ही तो अपना काम है।‘-हकीम साहिब ने कहा।-‘इसी के साथ इनके दो काम और हुए।’
‘वह कौन से काम हुए?’-हमने पूछा।
‘इनकी अम्मी और नानी साहिबा बहुत नेक और वलिया औरतें हैं लेकिन वे भी बहुत भोली और भली हैं। डेढ़ साल से उन्होंने अपनी एक बेटी को ससुराल नहीं भेजा था। उन्होंने हमसे उस लड़की के बारे में सलाह मांगी कि हम इस लड़की को तलाक़ दिलवा कर दूसरी जगह इसका निकाह करने की सोच रहे हैं। हमने पूछा कि क्या ससुराल वाले लड़की को सताते हैं?
वह बोलीं कि नहीं सताते नहीं हैं। वे तो बहुत प्यार से रखते हैं।
हमने पूछा कि क्या ससुराल वाले लड़की को लेने नहीं आते?
अम्मी साहिबा ने बताया कि लेने के लिए भी वे अक्सर आते रहते हैं लेकिन हम ही नहीं भेजते।
हमने पूछा क्यों?
बोलीं कि वे इस लड़की से कहते हैं कि तुम हमारी बहू हो। बहू की तरह ज़ेवर और भारी कपड़े पहनकर रहा करो। हमारी लड़की को ज़ेवर और भारी कपड़ों की आदत नहीं है। इसलिए यह वहां जाना नहीं चाहती।
हमने कहा कि अगर आपने दूसरी जगह इस का निकाह कर दिया और उन्होंने इसे प्यार न दिया तो फिर आप क्या करेंगी? ये लोग इसे प्यार और इज़्ज़त देते हैं लिहाज़ा यहां से इसे तलाक़ न दिलाएं। अपनी बेटी को समझाएं और इसे इसकी ससुराल रूख़सत करें। आपस में तालमेल बैठाने के लिए समझदारी और मुहब्बत से काम लें। हालांकि हम इस वेलनेस कोचिंग की फ़ीस लेते हैं लेकिन हमने इनसे एक रूपया नहीं लिया। आने जाने का किराया तक ख़ुद हमने अपना ख़र्च किया।’-हकीम साहिब ने बताया।
हमने कहा-‘आपने बहुत नेक सलाह दी और चांदी चाचा के साथ उनकी बहन का घर भी बचा लिया, अल्हम्दुलिल्लाह!’
हकीम साहिब बोले-‘मियां हम कौन हैं बचाने वाले, वह अल्लाह है बचाने वाला। जिसे वह बचाना चाहता है, उसके लिए बचने के असबाब बना देता है। यह ज़मीनो आसमान उसी का मुल्क है और इसमें उसी का हुक्म चलता है।’
हकीम साहिब ने ख़ुद को भी हलाक होने से बचाया और हमारे अक़ीदे की इस्लाह भी कर दी।
हमने कहा कि और वह तीसरा काम कौन सा था हकीम साहिब?
हकीम साहिब बच्चे की तरह हमें ताकने लगे। बोले बता दूं?
हमने कहा-‘क्यों, यह आप क्यों पूछ रहे हैं?’
हकीम साहिब बोले-‘उस वाक़ये का ताल्लुक़ नीयत और तसव्वुर से है। अब तक की बातें तो आपका रीज़निंग माइंड समझ लेगा लेकिन तीसरा वाक़या आपके सिर पर से गुज़र सकता है।’
हमने कहा कि हमारे सिर से गुज़र भी गया तो ऊपर नीम है। वह उस नीम में जाकर अटक जाएगा।
वह और हम साथ साथ क़हक़हा मार कर हंसने लगे।
ज़रा हकीम साहिब की हंसी कम हो और वह बताने की हालत में आएं तो हम उनसे सुनेंगे ‘तसव्वुर की ताक़त का करिश्मा’

Thursday, March 17, 2016

Allahpathy अल्लाह का शुक्र कीजिए अपनी तकलीफ़ें दूर करने के लिए

एक सच्चा कि़स्सा, प्रेरक घटना
जैस्मीन ने अपनी सहेली की सलाह पर हमसे काॅन्टेक्ट किया। 

उसने हमें बताया कि वह बहुत दुखी है। उसने हमें अपने शौहर के बर्ताव और उसकी आदतों के बारे में बताया, जिनसे वह दुखी थी। हमने कहा कि हम आपको गाइडेन्स देंगे और आप इस अज़ाब से निकल आएंगी, इन्-शा अल्लाह!
परसों रात यानि 2 फ़रवरी 2016 की रात को 1ः20 पीएम पर, जैस्मीन ने व्हाट्स एप पर मैसेज करके कहा कि देखिए मौलाना साहब! यह वक़्त हो रहा है और वह अभी तक घर नहीं आए। रोज़ ही घर लेट आते हैं। मैं आपको यह बात बताना भूल गई थी कि उनकी सबसे बड़ी आदत यह है।’
कल जैस्मीन ने काॅल करके माफ़ी चाही कि साॅरी मौलाना साहब, मैंने आपको इतनी रात में मैसेज करके परेशान किया, लेकिन मैं आपको बताना चाहती थी कि मेरी सबसे बड़ी प्राॅब्लम यह है कि वह देर रात को घर लौटते हैं।
मैंने कहा कि जैस्मीन, यह तुम्हारी सबसे बड़ी प्राॅब्लम तो क्या, यह तुम्हारी सबसे छोटी प्राॅब्लम भी नहीं है लेकिन तुम अपने इसे अपने एटीटयूड की वजह से प्राॅब्लम समझ रही हो। हक़ीक़त यह है कि प्राॅब्लम तुम्हारे दिमाग़ में है।
जैस्मीन बोली-‘मैं समझी नहीं।’ 
मैंने कहा कि इसी मुल्क में ऐसी औरतें हैं, जिनके शौहर फ़ौजी हैं और वे मुल्क की सरहदों पर ड्यूटी दे रहे हैं। वे छः महीने में घर आते हैं। अगर उनके शौहर रोज़ घर आने लगें लेकिन रात को डेढ़ दो बजे घर लौटें तो वे इस पर ख़ुश होंगी कि डेढ़ दो बजे की कोई बात नहीं, अपना शौहर रोज़ रात को घर तो आ जाता है।
यह सुनकर जैस्मीन बेइखि़्तयार क़हक़हा लगाकर हंस पड़ी और फिर काफ़ी देर तक हंसती ही रही।
जैस्मीन बोली कि मेरी सहेली ने आपके बारे में सही कहा था कि आपसे अपनी परेशानी बताने के बाद वह परेशानी ही नहीं लगती।
मैंने फिर उसे एक मिसाल और दी। मैंने कहा कि जिन औरतों के शौहर सऊदी अरब हैं। वे साल में एक बार घर आते हैं। उनकी बीवियां इस बात पर बहुत ख़ुश होंगी, अगर उनके शौहर का काम यहीं लग जाए और वे रोज़ रात को घर आ जाया करें। वे कहेंगी कि अगर उनके शौहर तीन बजे भी आया करें तो यह उनके लिए ख़ुशी की बात होगी।
जो बात उनके लिए ख़ुशी की होगी, वही बात तुम्हें दुख दे रही है। एक ही बात एक को ख़ुशी और दूसरे को ग़म क्यों दे रही है?, 
सिर्फ़ इसलिए कि उस बात को लेकर दोनों का नज़रिया और एटीट्यूड अलग अलग है।
सो अपने मियां को वक़्त का पाबन्द करने का ख़याल छोड़ दो और और उसकी शिकायत भी छोड़ दो। उसकी इस बात पर अल्लाह का शुक्र अदा करो कि तुम्हारा शौहर रोज़ रात को अपने घर आ जाता है।
जैस्मीन हंसे ही जा रही थी। मुझे भी हंसी आने लगी और हंसते हंसते ही जैस्मीन ने काॅल ख़त्म करने की इजाज़त चाही। उसने सलाम किया और बात पूरी हुई।
यह है अल्लाहपैथी का करिश्मा। अल्लाहपैथी कहती है कि हर बात को आप दो पहलुओं से देख सकते हैं।
1. शिकायत का पहलू
2. शुक्र का पहलू
जब आप किसी बात को शिकायत के पहलू से देखते हैं तो आप अज़ाब (कष्ट) महसूस करते हैं।
और जब आप उसी बात को शुक्र के पहलू से देखते हैं तो आप को ख़ुशी महसूस होती है। ख़ुशी की हालत में अज़ाब महसूस नहीं हो सकता क्योंकि जो दो चीज़ें एक दूसरे के खि़लाफ़ हों, वे एक वक़्त में एक ही जगह जमा नहीं हो सकतीं। जैसे कि रात के वक़्त दिन मौजूद नहीं हो सकता।
अब आपका काम यह चुनाव करना है कि आप बात को किस पहलू से देखते हैं?
इसके बाद अंजाम पहले से तय है।
अगर आप अज़ाब से नजात, कष्ट से मुक्ति चाहते हैं तो हर बात को शुक्र के पहले से देखने की ‘आदत’ डेवलप कीजिए। अज़ाब दूर हो जाएगा।
अल्लाह ने क़ुरआन में अपने इसी क़ानून की तालीम दी है-
अल्लाह तुम्हें अज़ाब क्यों देगा अगर तुम उसका शुक्र करते हो और उस पर ईमान रखते हो, अल्लाह शाकिर और अलीम है।

Saturday, February 6, 2016

जानिए, हिफ़ाज़त के लिए क्या ज़रूरी है? Al-Hafeez, Allahpathy

अल्लाह तआला ने कहा है कि
‘व-अम्मस्-साइला फ़-ला तन्हर’
यानि ‘और मांगने वाले को झिड़की न देना।’ (क़ुरआन 93,10)
हमने साइल को झिड़क दिया। नतीजा यह हुआ कि घर से बाहर निकले और हमारा एक्सीडेन्ट हो गया।
क़ुरआन की बात के खि़लाफ़ करने का अन्जाम कभी ख़ैर नहीं हो सकता।
‘मन अमिला सालिहन फ़लि नफ़्सिहि व-मन असाआ फ़-अलैइहा’
यानि जो नेकी करता है सो वह अपनी जान (की फ़लाह) के लिए करता है और जो बुराई करता है तो वह भी उसी पर पड़ती है। (क़ुरआन)
हमारी मोटर साइकिल का मडगार्ड और लाइट टूट गई। जिसकी मरम्मत में हमारे छः सौ नब्बे रूपये लग गए।
यह हमारी बुराई थी जो हमारे सामने आ गई।
इसी के साथ बात यह भी थी कि हमारी नीयत नेक थी। सो वह नेकी भी हमारे लिए ढाल बन गई और हमारे ख़राश तक न आई। मोटर सायकिल गिरने से पहले ही हम उससे न जाने कैसे ख़ुद ही उतर कर ज़मीन पर क़दम जमा कर खड़े हो गए। हमें ऐसा लगा जैसे किसी ने हिफ़ाज़त से पकड़ उतारा हो और फिर पूरे इत्मीनान से ज़मीन पर खड़ा कर दिया हो।
किसी सवारी पर बैठते वक़्त हम अल्लाह के नाम ‘या हफ़ीज़ु या सलाम’ हिफ़ाज़त की नीयत से काफ़ी पढ़ते हैं।
सो उस दिन भी पढ़े थे। यह भी एक नेकी थी।

हर फ़जऱ् नमाज़ के बाद हम आयतुल-कुर्सी भी पढ़ते हैं। 
सुबह शाम और भी कुछ दुआएं हिफ़ाज़त, ग़लबे और बरकत के लिए हम पढ़ते हैं। अल्-हम्दुलिल्लाह!
हमारी नेकियां और बदी मिलकर एक अंजाम की सूरत इखि़्तयार कर गईं। जिसे हमने देख लिया और भुगत लिया।
इस भूमिका के बाद हम आपको कि़स्सा सुनाते हैं कि हक़ीक़त में हुआ क्या था?
आज से तक़रीबन एक साल पहले की बात है। हम आॅफि़स के लिए निकलने की तैयारी कर ही रहे थे कि एक पेशेवर फ़क़ीर दरवाज़े पर आ गया। वह एक टीन एजर था। उसने हरा कपड़ा सिर पर बांध रखा था। हमें बड़ा एहसास हुआ कि वह अभी नई उम्र में ही भीख मांगने के धंधे पर लग गया, जो कि इसलाम में हराम है।
इसी के साथ हमें यह शर्म भी महसूस हुई कि हिन्दू देखेंगे तो क्या सोचेंगे?
हम एक ऐसी काॅलोनी में रहते हैं, जिसमें 97 प्रतिशत हिन्दू भाई रहते हैं। 
हम उन्हें कलिमा ए हक़ पहुंचाते हैं। उसका गश्त इसलाम की छवि को नुक़्सान पहुंचा रहा था। हम ठहरे दाई।
सो हमने उसे समझाया कि भाई तू भीख मांगने का धंधा मत कर। कहीं जाकर केले वग़ैरह का रेहड़ा लगा ले।
वह पूछने लगा कि केले कहां मिलते हैं?
बस हमें ग़ुस्सा ही तो आ गया। पूरे शहर में भीख मांगते हुए घूमता है और पूछता है कि केले कहां मिलते हैं?
हमने कहा कि तू कहां रहता है?
उसने कहा कि बाबा कालेशाह की खि़दमत में रहता हूं।
काला आम चैराहे पर एक बुज़ुर्ग की कच्ची पक्की सी क़ब्र हुआ करती थी। पास में कोर्ट और सरकारी आॅफि़स बहुत हैं। गांव से आने वाले देहाती ज़रूरतमन्द उनकी क़ब्र पर खड़े होकर दुआ कर लेते थे। वक़्त के साथ भीड़ बढ़ी तो जाति से फ़क़ीर बने हुए लोगों ने उसे चन्दे से सजा दिया और उसे पक्के मज़ार की शक्ल दे दी। वहां लाखों रूपये सालाना का चढ़ावा आने लगा। वह एक बिज़नेस प्वाइंट बन गया। 
हम उधर से गुज़रते हैं तो हम शरई तरीक़े से सलाम करके ईसाले सवाब ज़रूर करते हैं और बस।
अब इस मज़ार पर हमारे देखते ही देखते साल में दो बार उर्स भी होने लगे और पब्लिक को भाने वाली क़व्वालियां भी होने लगीं। औरत-मर्द अदाकार और कलाकार भी आने लगे। चीफ़ गेस्ट प्रशासन के अधिकारी होते हैं। अनपढ़ फ़क़ीर इस दरगाह के सज्जादे हैं, वह उनकी बग़ल में बैठते हैं। 
हमने पूछा कि तुझे नमाज़ की दुआएं याद हैं?
वह चुप रहा।
हमने कहा कि तुझे नमाज़ याद नहीं है तो तू बाबा कालेशाह की खि़दमत में क्यों रहने लगा, जबकि उन्होंने तुझसे कभी कहा नहीं कहा अपनी खि़दमत में रहने के लिए?
वह चुपचाप टुकुर टुकुर हमें देखने लगा।
हमारा ग़ुस्सा और ज़्यादा भड़क गया।
हम घर के अन्दर से एक डन्डा उठा लाए और आर्य समाजियों के से अन्दाज़ में उसे झिड़कते हुए धमकाया कि यहां से फ़ौरन भाग जा। फिर कभी यहां नज़र आया तो ठीक नहीं होगा।
वह नौजवान वहां से चला गया।
उसके जाते ही हमारे दिल में खटक हुई कि हमसे ज़रा सी चूक हो गई है। हमें उसे समझाना तो चाहिए था लेकिन झिड़कना नहीं चाहिए था।
बहरहाल हम तैयार होकर घर से बाइक पर निकले। रोड क्राॅस करके कोर्ट के गेट में दाखि़ल हुए। स्पीड 10 किमी. जैसी मामूली रही होगी। एक आदमी सामने आ गया। हाॅर्न ख़राब था। बचाने के चक्कर में बाइक पर से क़ाबू जाता रहा और वह फिसलते हुए आगे को घिसटी और सामने खड़ी एंगल राॅड में जा टकराई।
अल्लाह के यूनिवर्सल लाॅ पक्षपात नहीं करते। वे दाई-ग़ैरदाई और हिन्दू-मुस्लिम नहीं देखते।
जिसकी नीयत और आमाल का जोड़-घटा होकर जो कुल अंजाम बन रहा होता है। वह सूरते हाल उसे पेश आ जाती है।
इस तरह के वाक़यात हम सबकी जि़न्दगी में पेश आते हैं। जिनसे क़ुरआन का हक़ होना साबित होता रहता है और यह भी कि क़ुरआन ने हर उस बात से हमें आगाह कर दिया है, जिससे नुक़्सान हो सकता हो।
लिहाज़ा हम सबको अल्लाह की हिदायत ‘क़ुरआन’ के बताए तरीक़े पर पूरी होशमन्दी से चलना चाहिए। इसी में हमारी सलामती और फ़लाह है।
यह हमारा तजुर्बा है।
अल्-हम्दुलिल्लाह!

Tuesday, December 15, 2015

Allahpathy यक़ीनन आपका कल (Future) सुनहरा है

प्रश्नः अनवर साहब, आज जो विश्व में हो रहा है, उसका उपसंहार क्या होगा? आप एक क़ाबिल इंसान हैं, आप कल को कैसा पाते हैं?
हमारे ब्लाॅग के एक क़ाबिल पाठक भाई दशरथ दुबे जी ने यह सवाल हमसे पिछली ब्लाॅग पोस्ट पर किया है।
इसके जवाब में यह पोस्ट हाजि़र है।
उत्तरः जो कुछ विश्व में कल हुआ था, उससे आज के हालात बने और ये बहुत अच्छे हालात हैं, इनमें कुछ हालतें जीवन के खि़लाफ़ हैं लेकिन यही हालतें वास्तव मे जीवन को सपोर्ट करती हैं जैसे कि रात का अंधेरा दिन के उजाले के ठीक उलट दिखता है लेकिन रात का अंधेरा हमारे जीवन के लिए उतना ही ज़रूरी है, जितना कि दिन का उजाला।
तनाव, दंगे और जंगें, जो आज दुनिया में दिखाई दे रही हैं, ये सब शांति की शदीद ज़रूरत का एहसास करवा रही हैं।
यहां ‘डिमांड एंड सप्लाई’ का नियम काम कर रहा है। शांति की मांग का मतलब है कि शांति की सप्लाई यक़ीनी है। यह प्रकृति का नियम है। यह हर हाल में हो कर रहने वाली बात है।
आप देखेंगे कि आज विश्व में पहले से कहीं ज़्यादा संस्थाएं विश्व शांति के लिए काम कर रही हैं।
उन सबकी नीयत और मेहनत हमें यक़ीन दिलाती है कि हमारा कल सुरक्षित है और वह सुनहरा भी है।
हक़ीक़त यह है कि हमें दुनिया ठीक नज़र आएगी, अगर हम उसे ठीक नज़रिए से देखना चाहें।
दुनिया की घटनाओं से हमारा विश्वास हरगिज़ प्रभावित न होना चाहिए बल्कि हमें उससे उसकी ज़रूरत को समझकर उसके साॅल्यूशन तक पहुंचना चाहिए और फिर पूरे विश्वास के साथ उस साॅल्यूशन को दुनिया में वुजूद में लाने की कोशिश करनी चाहिए। 
हमारी आज की नीयतें और अमल ही हमारे कल को तय करती हैं।
...और हरेक व्यक्ति को यह देखना चाहिए कि उसने कल के लिए क्या भेजा है?
पवित्र क़ुरआन 59:18

इस पोस्टत पर  कॉमेंट:
dubey
December 15,2015 at 07:53 AM IST
काश !, ऐसा ही हो जैसा आपने कहा.......और हम छोटे लोगों की बात को ऐसा तवज्जो देने के लिये ,आपका आभार...........
जवाब दें

Arun Choudhary
December 15,2015 at 06:04 AM IST
अच्छा लिखे है
जवाब दें

Jawahar Lal Singh
December 15,2015 at 05:15 AM IST
उम्मीद पर दुनिया कायम है - किसी अच्छे दर्शनिक ने ही कहा होगा. आपके आशावादी विचार से प्रेरित ब्लॉग का स्वागत करता हूँ.
जवाब दें
(Jawahar Lal Singh को जवाब )- Anwer Jamal
December 15,2015 at 11:10 AM IST
जवाहर भाई! यह कोरा आशावाद नहीं है. जो कुछ हमने कहा है. वह हक़ीक़त है. आप अपने घर से अपने खेत या अपने कार्यालय तक जहाँ तक जाना चाहें, जाएं. आपको वहां तक शान्ति और व्यवस्था मिलेगी.
यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है कि आपके हर तरफ शान्ति है.
...
लोग यह हक़ीक़त, यह सत्य भूल जाते हैं, जब वे मीडिया द्वारा प्रायोजित खबरें देखते और पढ़ते हैं.
उनसे एक भ्रम उत्पन्न होता है, जो नज़र पर पर्दा डाल देता है.
...
शान्ति आज का सत्य है और आज ही कल का नतीजा बनकर आयेगा तो कल भी शान्ति ही है.
...
हरेक घर में मां अपने लाडलों को चूम रही है.
इस दिव्य प्रेम से इतनी ऊर्जा पैदा हो रही है, जो हरेक जंग और तनाव की नकारात्मकता को ऐसे मिटा देगा जैसे उडती धूल पर बारिश पड़ती है तो वह ज़मीन पर वापस आ जाती है.
धन्यवाद.
जवाब दें

Realize
December 14,2015 at 01:31 PM IST
Hats off to you sir for this valuable message.
From where you grab these knowledge.
Thanks.
जवाब दें
(Realize को जवाब )- Anwer Jamal
December 14,2015 at 05:03 PM IST
राजेश भाई! ज्ञान हरेक के पास है, ज़रूरत है निष्पक्ष होकर उस पर ध्यान देने की. ज्ञान सबकी आत्मा में 'इनबिल्ट' है.
आम तौर से लोग लॉजिक पर जीते हैं और अंदर से जो प्रेरणा आती है, उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं.
इंसान को चाहिए कि वह अपने आप को ठीक से जाने और फिर अपनी तमाम काबिलियत का पूरा इस्तेमाल करे.
प्रेम में जीने को अपना स्वभाव बना लेने से आत्मा के रहस्य खुद ही खुलते चले जाते हैं.
फिर भौतिक वस्तुएं भी खुद ही खिंची चली आती हैं, जिनके लिए दूसरे खून बहा रहे होते हैं या बेईमानी कर रहे होते हैं.
विश्वास (ईमान) से आपको वह सब मिलता है जो आपको अपने वुजूद के क़ायम रखने और तरक़्क़ी करने के लिए ज़रूरी है.
यह नेचर का लॉ है.
....
कॉमेंट के लिए आपका शुक्रिया.

Source: 

यक़ीनन आपका कल सुनहरा है

Monday, December 14, 2015

Allahpathy अपनी मुक्ति, अपना आनंद अपने हाथ। जानिए कैसे?

आम लोग आज डरे हुए हैं, वे आतंकित हैं।
उन्हें लगता है कि वे ख़तरे में हैं। चोर, डाकू, अपहरणकर्ता, स्मग्लर, नशेड़ी और आतंकवादी हर तरफ़ घूम रहे हैं। उनकी जान, माल और उनकी औलाद महफ़ूज़ नहीं है। अफ़सर रिश्वतख़ोर हो गए हैं। उन्हें नेताओं की छत्रछाया मिली हुई है, जिन्हें जनता ख़ुद चुनती है। जनता बेचारी है, जाए तो कहां जाए, वह करे तो क्या करे?
आम लोगों को कोई बताता है कि हमारे नेता पूंजीपतियों से मिले हुए हैं, जो जनता का ख़ून चूस रहे हैं और मिली-भगत करके मोटी मलाई अंदर कर रहे हैं। हर तरफ़ बेईमानी और लूटमर मची हुई है। जो जितना बड़ा बेईमान है, वह उतने ही बड़े पद पर पहुंच रहा है।
....
आज यह अक्सर आम लोगों की मानसिकता है, जो एक दिन में नहीं बनी है बल्कि ‘सिमसिम‘ यानि तिल तिल करके बनी है। यह ख़ुद नहीं बनी है बल्कि इसे बनाया गया है।
यह नकारात्मक मानसिकता बहुत घातक है। यह घातक मानसिकता उन सूचनाओं से बनाई गई है, जो कि जनता के सामने टी.वी., रेडियो, इंटरनेट और अख़बारों के ज़रिये परोसी जाती है।
हमारा माइंड इस सारे डाटा को लेकर प्राॅसेस करता है और फिर नतीजा (conviction) निकालता है। केवल नकारात्मक डाटा पर विचार करने के बाद फ़ैसला हमेशा नकारात्मक ही निकलेगा। यह तय है।
उसी डाटा में थोड़े सी पाॅजि़टिव ख़बरें भी डाल दी जाएं तो आखि़री फ़ैसला (conviction) बदल जाएगा।
पाॅजि़टिव डाटा को ज़्यादा कर दिया जाए, तो आखि़री फ़ैसला और ज़्यादा पाॅजि़टिव हो जाएगा।
यह सब डाटा की अदला बदली का कमाल है जबकि रिएलिटी यानि हक़ीक़त अपनी जगह वही रहती है, जो कि है।
आम जनता हक़ीक़त नहीं जानती। वह उस डाटा को जानती है, जो कि उसे दिया जाता है। आम लोगों को यह पता ही नहीं चलता कि उनके माइंड से खेला जा रहा है। उन्हें वही सोचने के लिए मजबूर किया जा रहा है जो कि ‘एलीट क्लास’ उनसे चाहती है कि आम जनता यह सोचे और यह निर्णय ले।
आम जनता को ‘एक ख़ास फ़ैसला’ लेने के लिए मजबूर किया जाता है और वह लेती रहती है। यह मानसिक ग़ुलामी (psychic enslavement) है।
हमारे मीडिया की अक्सरियत ‘नकारात्मकता’ पर है।
पूरे दिल्ली में लाखों फैमिली रहती हैं। सब घरों में बहू-बेटियां महफ़ूज़ हैं। उनकी हिफ़ाज़त मीडिया के लिए ख़बर नहीं बनती। दस-बीस जगहों पर रेप हो गया तो मीडिया के लोग दौड़कर जाएंगे और इसे छापकर हर तरफ़ फैला देंगे।
यही हाल चोरी, लूट, और डकैती का है। सबकी दुकानें और सबका माल दिन रात महफ़ूज़ है। दिल्ली में हर तरफ़ पुलिस के सैकड़ों अधिकारी और हज़ारों सिपाही दिन-रात, सर्दी-गर्मी और बारिश में अपनी ड्यूटी पर लगे हुए हैं। यह हिफ़ाज़त और यह ड्यूटी देना मीडिया में जगह नहीं पाता लेकिन चोरी, लूट और डकैती की एक घटना को मीडिया सुखिऱ्यों में जगह देती है।
सरकारी कर्मचारी जो काम करते हैं, उसे पूरा फ़ोकस और सम्मान नहीं मिलता लेकिन उनकी बेईमानी और निकम्मेपन को हाईलाईट किया जाता है।
हमारे नेता, चाहे वे किसी भी पार्टी के हों, लोगों की फ़रियाद भी सुनते हैं और अपने अपने इलाक़ों में विकास के काम भी करते हैं। उन्हें भी देखा जाना चाहिए।
आतंकवाद की गिनी चुनी घटनाएं सिर्फ़ चन्द जगहों पर होती हैं। उनके अलावा हर तरफ़ हर समय शान्ति ही रहती है। हर तरफ़ लोग एक दूसरे से प्रेम और हमदर्दी का बर्ताव कर रहे हैं। एक दूसरे की ज़रूरत में काम आ रहे हैं। ज़रूरत पड़ने पर अपना ख़ून और अपने अंग तक दान कर रहे हैं। भोजन-कपड़ा और रूपया ज़रूरतमंदों को दान करना तो हरेक आदमी की आदत है। रोज़मर्रा के जीवन का ढर्रा यही है। इस महान अचीवमेंट को मीडिया में जगह नहीं मिलती लेकिन आतंकवाद की घटनाओं को प्रमुखता दी जाती है।
मीडिया की डिज़ायनिंग जिसने की है, उसने ऐसे ही की है। ऐसा उसने अपने मक़सद को पूरा करने के लिए किया है लेकिन इससे आम जनता का मक़सद पूरा नहीं होता। आम जनता का भला मीडिया की इस ‘नकारात्मकता’ से नहीं होता बल्कि इससे उसका बुरा ही होता है। इससे लोगों के दिलों में डर और तनाव पैदा होता है। बार बार बरसों यही सब रिपीट होने से यह उसके मन में जम जाता है।
डर और तनाव 95 प्रतिशत बीमारियों की जड़ है।
हक़ीक़त यही है कि बीमारियों की असली वजह सिर्फ़ एक ‘भ्रम’ (माया, illusion, वसवसे, बातिल ग़र्र) है, जिसे रिपीट सजेशन के ज़रिए लोगों के मन का विश्वास बना दिया गया है।
‘विश्वास’ का असर यह होता है कि हरेक आदमी को वही अनुभव होने लगाता है, जैसा उसका विश्वास होता है।
मिसालः
अगर चार-पांच लोग एक आदमी से अलग अलग जगहों पर पूछ लें कि क्या बात है भाई, आप कुछ बीमार से दिखाई दे रहे हैं?
तो उसके मन में आएगा कि इतने सारे लोग ग़लत नहीं कह सकते। उसे ज़रूर कुछ न कुछ हो गया है। फिर वह डाॅक्टर के पास जाएगा। डाॅक्टर उसके ब्लड, लिवर, किडनी, बीपी, शुगर, कैल्शियम और वेट की जांच कराएगा। उन सबमें ‘कुछ’ गड़बड़ मिल ही जाएगा। बस जो पहले एक शक था, अब वह उसका यक़ीन बन जाएगा। अब वह एक मरीज़ की तरह महसूस करेगा और एक मरीज़ की तरह ही दवा परहेज़ सब करेगा।
यह सब एक इल्यूज़न है। इसे आप जब चाहें क्रिएट कर सकते हैं।
...और आप जब चाहें तब इसे डिलीट भी कर सकते हैं।
ऐसे ही आप अक्सर बीमारियों को बिना किसी दवा के डिलीट कर सकते हैं।
...क्योंकि हक़ीक़त यह है कि आप सब पूरी तरह स्वस्थ हैं सिवाय उनके जिनमें कोई शारीरिक विकृति है।
साॅल्यूशनः
नकारात्मक मीडिया की ट्राँस से भी आप जब चाहे तब निकल सकते हैं।
1. इसके लिए आप सबसे पहले इनसे सूचनाएं यानि डाटा लेना बंद कर दें और जो पाॅजि़टिव एट्टीट्यूड का टी.वी. चैनल और अख़बार हो, उसे देखें-पढ़ें। आपको कोई ऐसा न मिले तो आप इनसे बचें।
2. जिस चीज़ के बारे में आपके मन में डर समा गया हो, उसे ख़ुद अपने माध्यमों से जानने की कोशिश करें। इससे आपको नए डाटा मिलेंगे और उस चीज़ की ज़्यादा सही तस्वीर आप देख पाएंगे।
3. नई इमेज पुरानी इमेज को मिटा देगी और आप पुरानी इमेज से उपजे डर और तनाव से भी मुक्त हो जाएंगे।
4. आप नेचर को देखिए। आप रोज़ाना निकलते हुए सूरज, खिलते हुए गुलाब, खिलती हुई धूप, बरसती हुई बारिश, बहती नदियों, उगते पौधों को, फलों और सब्जि़यों को देखिए।
आप देखेंगे कि ज़मीन से आसमान तक, हर चीज़ लाईफ़ को सपोर्ट कर रही है।
हर चीज़ आपको सपोर्ट कर रही है।
आप एक ऐसी नेचर में हैं, जो आपको सपोर्ट कर रही है।
आखि़री फ़ैसला अब यह आएगा कि मैं पूरी तरह सही जगह पर हूं और मैं सेफ़ हूँ।
अब आप एक सही बात पर विश्वास कर रहे हैं।
अब आप भ्रम (माया, illusion) से मुक्त हैं। आपको मुक्ति मिल चुकी है। अब आप ‘सत्य के ज्ञानी’ हैं।
अब आप दूसरे अज्ञानियों को भी सत्य का ज्ञान देकर उन्हें मिथ्या माया के अंधकार से, उससे उपजे डर और तनाव से मुक्त होने में मदद कर सकते हैं।
आपका विश्वास आपको आनंद देगा, जो हर पल बढ़ता ही जाएगा।
अब आप अस्तित्व को उपलब्ध हो चुके हैं।
मुबारक हो!
आपके जन्म का उद्देश्य पूरा हुआ। आपकी यात्रा सफल हुई।
अब आपके जीवन में आपके विश्वास के अनुरूप आनंद देने वाले हालात आपको अनुभव होंगे।
नज़रिया बदलते ही अब आपके हालात ख़ुद ब ख़ुद बदलते चले जाएंगे।
इस परम सत्य को ज्ञानियों ने हर काल में हर भाषा में बताया है। आज क्वांटम फि़जि़क्स और सायकोलाॅजी भी यही कह रही है।

Friday, December 4, 2015

समाज में नफ़रत भड़काने की बीमारी का इलाज क्या है?

नफ़रत के शब्दों से नफ़रत फैलती है और प्रेम के शब्दों से प्रेम।
नफ़रत आग लगाती है जबकि प्रेम नफ़रत की आग को बुझाता है।
नफ़रत दिलों को तोड़ती है जबकि प्रेम दिलों को जोड़ता है। फिर जैसी हालत दिल की होती है, वही समाज में अपना असर ज़ाहिर करती है।
 
जिस समाज के सदस्य प्रेम की वाणी बोलते हैं, वह समाज जुड़ा रहता है। यही सूफ़ी-संतों का पैग़ाम हम सबके नाम सदा से रहा है। इसी में सबका हित है।
...लेकिन सूफ़ी-संतों की बात सब नहीं मानते। ये नफ़रत की बातें करते हैं और समाज में नफ़रत फैलाते हैं। जनता को भ्रम में डालने के लिए ये दीन-धर्म की रक्षा और प्रचार की आड़ लेते हैं।
इस विचारधारा के संगठनों के मुखिया चाहते हैं कि वे जनता का भला कुछ भी न करें लेकिन फिर भी जनता उन्हें सत्ता सौंप दे क्योंकि वे अमुक जाति या वंश के हैं या प्राचीन काल में उनकी बड़ी तूती बोलती थी।  
अपने ग़लत मक़सद के लिए वे लोगों को भड़काते और आपस में लड़ाते हैं। ये सब समाज में भयानक बीमारियाँ फैलाते हैं।
दीन से फ़लाह होती है यानि धर्म से कल्याण होता है।
फ़लाह यानि कल्याण से ही इस बात की पहचान होती है कि यह बात धर्म की है या अधर्म की?
जो लोग समाज में नफ़रत की आग फैला रहे हैं। वे दीनी-धार्मिक लोग नहीं हैं। इनकी बातों से कभी किसी का कल्याण नहीं हुआ। ये केवल भड़काऊ बातें करते हैं, जिन्हें कहने से इनका दीन-धर्म रोकता है। इनकी बातों से ही जनता इन्हें पहचान लेती है।
जनता लगातार जागरूक होती जा रही है। उसकी चेतना का अपहरण करके उसे अपना दास बनाने की कोशिशें अब सफल नहीं होतीं।
फिर भी अभी कुछ नादान और जज़्बाती लोग हैं, जिन्हें अपने और अपने समाज के हित की समझ नहीं है। बस यही लोग इन अपहरणकर्ताओं के मानसिक दास रह गए हैं। नुक़्सान उठाकर ये भी समय के साथ समझ ही जाएंगे कि प्रेम से ही कल्याण संभव है।
अब धर्म की समझ सबको आती जा रही है। सब कल्याण चाहते हैं। इसीलिए सब प्रेम का व्यवहार करते हैं। सब मिलजुल कर रहते हैं। सबके कल्याण का स्तर पहले के मुक़ाबले लगातार बढ़ता जा रहा है। यह ख़ुशी की बात है।